किसानों, शिक्षा, इलाज और बैंकिंग व्यवस्था पर सवाल — आखिर सरकार क्या कर रही है?

  • रिपोर्ट-मनोज कुमार यादव

हमारे देश की व्यवस्था का सच यही है कि आम आदमी हर जगह लुट रहा है। न खेत–खलिहान सुरक्षित हैं, न शिक्षा, न इलाज और न ही बैंकिंग प्रणाली। हर जगह नियम बनाने वाले खुद व्यापारी, स्कूल संचालक, अस्पताल मालिक और बैंक ही हैं। सवाल यह है कि जब जनता का शोषण खुलेआम हो रहा है तो सरकार और कानून की आंखें क्यों बंद हैं?

देश की रीढ़ कहे जाने वाले किसान अपनी मेहनत से फसल उगाते हैं, लेकिन जब उसे बेचने की बारी आती है तो मंडियों में बैठे व्यापारी उसका भाव तय करते हैं। किसान लागत से भी कम दाम पर फसल बेचने को मजबूर होता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की घोषणा तो सरकार करती है लेकिन अधिकांश फसलों को उस भाव पर खरीदने की गारंटी नहीं होती। नतीजा यह कि किसान कर्जदार होता चला जाता है।

शिक्षा को सेवा नहीं बल्कि धंधा बना दिया गया है। प्राइवेट स्कूल मनमानी फीस वसूलते हैं, किताबें और यूनिफार्म भी अपने ठेकेदारों से दिलवाते हैं। अभिभावक मजबूरी में हर साल बढ़ी हुई फीस चुकाने को मजबूर हैं। सरकारी स्कूलों की हालत ऐसी कर दी गई है कि लोग वहाँ बच्चों को पढ़ाना ही नहीं चाहते। सवाल उठता है कि आखिर शिक्षा का अधिकार कानून किसके लिए है?

बीमार होने पर मरीज जीवन बचाने अस्पताल जाता है लेकिन वहाँ इलाज से पहले बिल थमा दिया जाता है। निजी अस्पतालों में डॉक्टर और प्रबंधन मनमाने पैकेज बनाकर मरीजों को लूटते हैं। दवाओं और जांचों में भी भारी कमीशनखोरी होती है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार इलाज के बोझ तले दब जाते हैं। सरकार के स्वास्थ्य योजनाओं का फायदा ज्यादातर दिखावे तक ही सीमित है।

बैंक, जो जनता की गाढ़ी कमाई से चलते हैं, वही जनता पर शर्तें थोपते हैं। न्यूनतम बैलेंस, सेवा शुल्क, एटीएम चार्ज, ट्रांजेक्शन शुल्क—हर जगह आम आदमी से पैसा वसूला जा रहा है। अगर खाता धारक नियम न निभा पाए तो पेनल्टी काट ली जाती है। यही बैंक बड़े उद्योगपतियों के अरबों-खरबों के कर्ज माफ कर देते हैं।

इन क्षेत्रों में स्थिति स्पष्ट है कि जनता का शोषण हो रहा है। लेकिन सरकार चुप है। कभी चुनावी वादों में MSP की गारंटी की बात होती है, कभी शिक्षा को सस्ता करने की, कभी स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने की। लेकिन जमीनी हकीकत में सब उल्टा है। कानून मौजूद हैं लेकिन उन पर अमल नहीं हो रहा। ऐसा लगता है मानो कानून और सरकार ने आंखों पर पट्टी बांध ली हो।

अगर ऐसा चलता रहा तो जनता का भरोसा सरकार और कानून दोनों से उठ जाएगा। लोकतंत्र में जनता सबसे बड़ी ताकत है, और जब जनता जागेगी तो यह लूट बंद करनी ही पड़ेगी।

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