जनहित या संपादकीय धारणा? हिंदी मीडिया की खबरों पर गंभीर सवाल

गुस्ताखी माफ हरियाणा – पवन कुमार बंसल

हमारे प्रबुद्ध पाठक डॉ. रणबीर सिंह फौगाट द्वारा

जनहित और समाचार पत्रों की धारणा

अधिकांश समाचार नकारात्मक होते हैं। हिंदी अखबारों में जिला या स्थानीय समाचारों के लिए निर्धारित चार से छह पन्नों में 60 प्रतिशत से अधिक खबरें नकारात्मक प्रकृति की होती हैं। शेष 30 प्रतिशत खबरें नियमित बीट से जुड़ी होती हैं, जिनमें से अधिकतर आम पाठक के लिए विशेष महत्व नहीं रखतीं। वास्तविक रूप से केवल लगभग 10 प्रतिशत सामग्री ही किसी विशेष वर्ग या व्यक्ति के लिए उपयोगी सिद्ध होती है।

यह प्रवृत्ति वर्षों से चली आ रही है और इसे बदलने का कोई गंभीर प्रयास दिखाई नहीं देता। यह केवल नकारात्मक या सकारात्मक खबरों का प्रश्न नहीं है, बल्कि चयन की प्रक्रिया का भी विषय है। संपादक किस आधार पर किसी समाचार को प्रकाशित करते हैं और किन खबरों को छोड़ देते हैं—इसका स्पष्ट उत्तर शायद ही कभी मिल पाता है। यदि सभी संपादकों की पसंद एक जैसी होती, तो सभी अखबार एक ही स्रोत से प्रकाशित सामग्री की प्रतिलिपि मात्र बनकर रह जाते। लेकिन ऐसा नहीं है।

समाचार और विचार पृष्ठों पर प्रकाशित सामग्री संपादकों की व्यक्तिगत समझ, प्रशिक्षण, भाषा पर पकड़, व्याकरण, शब्द चयन और प्रस्तुति शैली से प्रभावित होती है। यही कारण है कि एक ही प्रेस विज्ञप्ति या एजेंसी रिपोर्ट पर आधारित समाचार भी अलग-अलग अखबारों में भिन्न रूप में प्रकाशित होते हैं। यही विविधता का रहस्य है।

एक अनुभव

करीब तीन वर्ष पूर्व, गोरखपुर मेडिकल कॉलेज परिसर स्थित आईसीएमआर के क्षेत्रीय चिकित्सा अनुसंधान केंद्र में आयोजित एक वैज्ञानिक समीक्षा बैठक में भाग लेने का अवसर मिला। यह संस्थान डेंगू, जापानी इंसेफेलाइटिस और काला-आजार जैसी कीट-जनित बीमारियों पर शोध करता है। बैठक के बाद मैंने स्वयं दो पृष्ठों की एक विस्तृत हिंदी प्रेस विज्ञप्ति तैयार कर मीडिया को भेजी।

अगले दिन गोरखपुर से प्रकाशित अधिकांश हिंदी अखबारों ने उस विज्ञप्ति पर आधारित समाचार तो छापा, परंतु वैज्ञानिक तथ्यों और शोध के परिणामों को लगभग हटा दिया। खबर में शोध की उपलब्धियों और जनस्वास्थ्य पर उसके प्रभाव का उल्लेख नगण्य था। वहीं लखनऊ और बरेली से प्रकाशित ‘अमृत विचार’ ने उसी सामग्री को संक्षेप में लेकिन सार्थक रूप से प्रकाशित किया।

यह नहीं कहा जा सकता कि स्थानीय संवाददाता संस्थान के कार्य से अनभिज्ञ थे, परंतु वैज्ञानिक उपलब्धियों की गहराई और महत्व को समझने की दृष्टि का अभाव स्पष्ट दिखाई दिया। हिंदी मीडिया में विज्ञान पत्रकारिता का स्तर आज भी अपेक्षाकृत कमजोर है। अधिकांश पत्रकार मानविकी पृष्ठभूमि से आते हैं; विज्ञान स्नातकों की संख्या नगण्य है।

पाठक की रुचि बनाम मीडिया की धारणा

मीडिया जगत में यह धारणा प्रचलित है कि “हम वही प्रकाशित करते हैं जो जनहित में हो।” किंतु जनहित को निर्धारित करने वाली शक्तियाँ केवल संपादकीय कक्ष तक सीमित नहीं हैं। विज्ञापन, राजनीतिक संबंध, बाजार की बाध्यताएँ और सामाजिक दबाव भी इस प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।

अधिकांश पत्रकार खोजी पत्रकारिता को केवल भ्रष्टाचार और अपराध की पड़ताल तक सीमित मानते हैं। विज्ञान की राजनीति, शोध पद्धति या वैज्ञानिक संस्थानों की कार्यप्रणाली पर गंभीर पड़ताल विरले ही देखने को मिलती है। अंग्रेजी के कुछ बड़े समाचार पत्रों ने विज्ञान रिपोर्टिंग को महत्व दिया है, विशेषकर तब जब देश में वैज्ञानिक गतिविधियाँ बढ़ीं।

1970 के दशक में पीटीआई की साइंस सर्विस के प्रमुख डॉ. के.एस. जयरामन ने इस दिशा में मजबूत नींव रखी। ‘नेचर’ जैसे अंतरराष्ट्रीय जर्नल में भारत की वैज्ञानिक गतिविधियों पर नियमित रिपोर्टिंग की परंपरा बनी। परंतु भारत में अभी तक कोई सशक्त व्यावसायिक वैज्ञानिक पत्रिका विकसित नहीं हो सकी। अधिकांश विज्ञान जर्नल सरकारी सहयोग से चलते हैं और विज्ञान की राजनीति पर खुलकर लिखने में संकोच करते हैं।

 

ऐसी स्थिति में जनहित की परिभाषा पत्रकारों और संपादकों की व्यक्तिगत धारणा पर निर्भर हो जाती है। अपराध, भ्रष्टाचार और राजनीति पर अत्यधिक जोर ने सार्वजनिक विमर्श की गुणवत्ता को कमजोर किया है। रोग का निदान उपलब्ध है, परंतु उपचार के लिए इच्छाशक्ति का अभाव है।

अधिकांश हिंदी समाचार पत्र अब मुझे आकर्षित नहीं करते; पाँच मिनट पढ़ने के बाद उन्हें एक ओर रख देने का मन करता है। अपवाद अवश्य हैं, कुछ क्षेत्रीय पत्रों ने अपनी दिशा बदली है, परंतु स्थापित अंग्रेजी अखबारों में भी स्तर में गिरावट के संकेत दिखाई देते हैं।

— डॉ. रणबीर सिंह फौगाट

 

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