मिडिल ईस्ट में हालात तेजी से गंभीर होते जा रहे हैं। ईरान में महंगाई और आर्थिक बदहाली के खिलाफ लंबे समय से चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच अब अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की आशंका भी गहराने लगी है। ईरान को सऊदी अरब और इजराइल का कट्टर विरोधी माना जाता है, जबकि ये दोनों देश अमेरिका के करीबी सहयोगी हैं। ऐसे में अमेरिका की नजर ईरान के विशाल तेल और गैस भंडार पर होना मौजूदा तनाव की बड़ी वजह मानी जा रही है।
इसी बीच अमेरिकी नौसेना का USS अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप साउथ चाइना सी से मिडिल ईस्ट की ओर रवाना हो गया है। उधर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामनेई को कड़ी चेतावनी दी है कि अगर प्रदर्शनकारियों की हत्या होती है, तो अमेरिका सीधे ईरान पर हमला करेगा।
हालांकि बीते कुछ दिनों से ईरान में प्रदर्शनकारियों की हत्याएं रुकी हैं। पहले सत्ता विरोधी करीब 800 लोगों को सरेआम फांसी देने का फैसला लिया गया था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद इसे टाल दिया गया। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने भी फिलहाल ईरान पर हमले से इनकार किया है, लेकिन हालिया घटनाएं कुछ और ही संकेत दे रही हैं।
ईरान पर हमले के 5 बड़े संकेत
पहला संकेत:
US नेवी का न्यूक्लियर-पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर USS अब्राहम लिंकन अपने कैरियर स्ट्राइक ग्रुप के साथ मिडिल ईस्ट की ओर बढ़ रहा है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह फैसला ईरान के एयरस्पेस बंद होने के ठीक एक घंटे बाद लिया गया। इसे दुनिया के सबसे ताकतवर वॉरशिप्स में गिना जाता है और इसके मिडिल ईस्ट पहुंचने में करीब एक हफ्ता लग सकता है।
दूसरा संकेत:
अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में स्थित अपने कुछ सैन्य ठिकानों से स्टाफ को निकालना शुरू कर दिया है। रॉयटर्स के अनुसार, कतर के अल उदैद एयर बेस से कुछ कर्मचारियों को हटाने के निर्देश दिए गए हैं। यह मिडिल ईस्ट का सबसे बड़ा अमेरिकी बेस है, जहां करीब 10,000 सैनिक तैनात हैं। पूरे क्षेत्र में 30,000 से 40,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं।
तीसरा संकेत:
ईरान ने विरोध प्रदर्शनों के बीच अपने एयरस्पेस को ज्यादातर उड़ानों के लिए अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। इसके लिए NOTAM (नोटिस टू एयर मिशन्स) जारी किया गया है।
चौथा संकेत:
यह संकेत इजराइल से जुड़ा है। अमेरिका और इजराइल की दोस्ती जगजाहिर है। इतिहास बताता है कि जब भी मिडिल ईस्ट में बड़ा राजनीतिक या सैन्य संकट आता है, इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू देश से बाहर चले जाते हैं। हाल ही में ईरान-अमेरिका तनाव के दौरान भी नेतन्याहू का विमान इजराइल से बाहर देखा गया।
पांचवा संकेत:
पेंटागन से जुड़ी एक चर्चित ‘पेंटागन पिज्जा थ्योरी’ भी चर्चा में है। माना जाता है कि जब अमेरिकी रक्षा मुख्यालय के आसपास पिज्जा स्टोर्स पर ऑर्डर अचानक बढ़ जाते हैं, तो कोई न कोई सैन्य कार्रवाई होने वाली होती है।
ईरान के ताजा हालात
ईरान इस समय गहरे आर्थिक संकट से गुजर रहा है। भारी महंगाई, बेरोजगारी, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, मुद्रा की गिरावट और सख्त धार्मिक शासन के खिलाफ जनता सड़कों पर है। 28 दिसंबर 2025 से तेहरान में शुरू हुए प्रदर्शन देश के कई शहरों में फैल चुके हैं। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार अब तक 3,428 प्रदर्शनकारियों की मौत और 18,000 से अधिक गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, हालांकि संयुक्त राष्ट्र ने इन आंकड़ों की पुष्टि नहीं की है। तेहरान में इंटरनेट और अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट बंद हैं, जबकि सेना हाई अलर्ट पर है।
अमेरिका को ईरान से क्या चाहिए?
ईरान की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से तेल और प्राकृतिक गैस पर आधारित है। उसके पास करीब 208 अरब बैरल तेल भंडार है, जो दुनिया के कुल प्रमाणित तेल भंडार का लगभग 12% है। अगर अमेरिका ईरान पर नियंत्रण हासिल करता है, तो वैश्विक व्यापार के करीब 20% हिस्से पर उसकी पकड़ मजबूत हो सकती है। अमेरिका की खास दिलचस्पी होर्मुज स्ट्रेट और फारस की खाड़ी में है।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना अहम?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट है। दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का करीब 25% और LNG व्यापार का 20% इसी रास्ते से गुजरता है। यह फारस की खाड़ी से खुले समुद्र तक पहुंचने का एकमात्र जरिया है और फिलहाल इस पर ईरान का प्रभाव है।
ईरान का न्यूक्लियर प्रोजेक्ट भी बना कारण
ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी अमेरिका और पश्चिमी देशों की चिंता बढ़ी हुई है। उन्हें डर है कि ईरान न्यूक्लियर हथियार बनाकर मिडिल ईस्ट में अपना दबदबा बढ़ा सकता है। इसी वजह से अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं।
इन तमाम घटनाओं के बीच मिडिल ईस्ट में हालात बेहद नाजुक बने हुए हैं और दुनिया की नजरें अब अमेरिका के अगले कदम पर टिकी हैं।
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