क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि मंदिर में प्रवेश करते समय घंटी ज़रूर बजाई जाती है, लेकिन दर्शन के बाद बाहर निकलते समय वही घंटी दोबारा नहीं बजाई जाती?

Benefits of Ringing Temple Bell:जब भी कोई भक्त मंदिर जाता है, तो प्रवेश करते ही घंटी बजाना एक सामान्य परंपरा है, लेकिन दर्शन के बाद लौटते समय उसी घंटी को बजाना आवश्यक या प्रचलित नहीं माना जाता। अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों? क्या घंटी सिर्फ भगवान को बुलाने के लिए बजाई जाती है या इसके पीछे कोई गहरा कारण छुपा है?

दरअसल, मंदिर में घंटी बजाने की परंपरा केवल आस्था से नहीं, बल्कि मानव मन और मस्तिष्क की गहरी समझ से जुड़ी हुई है। अगर घंटी केवल भगवान को सूचित करने का माध्यम होती, तो फिर आते और जाते—दोनों समय इसे बजाया जाना चाहिए था। लेकिन इसका उद्देश्य कुछ और ही है।

मंदिर में प्रवेश करते समय ही घंटी क्यों बजाई जाती है?

हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और मंदिर से जुड़ी कई मान्यताएं हैं। मंदिर में घंटी बजाना भी इन्हीं धार्मिक परंपराओं का हिस्सा है। मान्यता के अनुसार, मंदिर में प्रवेश करते ही व्यक्ति बाहरी दुनिया—घर, काम, तनाव, चिंता और गुस्से—से खुद को अलग कर ईश्वर के समर्पण में आता है।

घंटी की तेज लेकिन संतुलित ध्वनि भटके हुए मन को एक झटके में रोक देती है। यह आवाज भगवान को नहीं, बल्कि इंसान के मन को संकेत देती है कि अब बाहर की बातें यहीं छोड़कर भीतर की शांति पर ध्यान केंद्रित किया जाए।

विज्ञान और न्यूरोसाइंस क्या कहता है?

न्यूरोसाइंस के अनुसार, घंटी की ध्वनि दिमाग के रेटिक्युलर एक्टिवेटिंग सिस्टम को सक्रिय करती है। यह सिस्टम तय करता है कि दिमाग अलर्ट रहेगा या भटकता रहेगा। घंटी की आवाज सुनते ही मस्तिष्क एक तरह से “रीसेट मोड” में चला जाता है, सोच की गति धीमी हो जाती है और ध्यान केंद्रित होने लगता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से भी माना जाता है कि घंटी की ध्वनि वातावरण को शुद्ध करती है, नकारात्मक ऊर्जा का नाश करती है और शरीर व मन में सकारात्मकता का संचार करती है। कई विद्वान इस ध्वनि को सृष्टि के आरंभिक नाद से भी जोड़कर देखते हैं।

फिर बाहर निकलते समय घंटी क्यों नहीं बजाई जाती?

यह सबसे अहम सवाल है। माना जाता है कि दर्शन के बाद भक्त का मन पहले ही स्थिर और शांत हो चुका होता है। भगवान से जुड़कर व्यक्ति सकारात्मक विचारों और ऊर्जा से भर जाता है। ऐसे में दोबारा घंटी बजाने से मन का ध्यान फिर से भटक सकता है।

दर्शन के बाद साधक भीतर से संतुलित अवस्था में होता है, इसलिए बाहर निकलते समय घंटी बजाने की आवश्यकता नहीं रहती। यह संकेत है कि मन अब अशांत नहीं, बल्कि शांति के साथ बाहरी दुनिया में लौट रहा है।

एक तरह की मानसिक ट्रेनिंग

यह परंपरा दरअसल एक प्रकार की मानसिक ट्रेनिंग है। आज जिसे मेडिटेशन, माइंडफुलनेस या ब्रेन-रीसेट कहा जाता है, वही काम मंदिर की घंटी कुछ ही सेकंड में कर देती है। शायद इसी वजह से हमारे पूर्वजों ने घंटी को मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थापित किया।

आज के दौर में क्यों और ज़रूरी है यह परंपरा?

मोबाइल, तनाव और भागदौड़ से भरी ज़िंदगी में दिमाग को वर्तमान में लाना सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। मंदिर की घंटी मन को उसी क्षण में ले आती है। शायद यही कारण है कि यह परंपरा हजारों वर्षों बाद भी बिना बदले आज तक चली आ रही है।

 

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डिस्क्लेमर- यहां दी गई जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं। khabrejunction.com इनकी पुष्टि नहीं करता।

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