नई दिल्ली: हरियाली अमावस्या सावन महीने की अमावस्या तिथि को मनाई जाती है। चारों ओर हरियाली होने के कारण इसे हरियाली अमावस्या कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस दिन स्नान, दान, ध्यान, पौधरोपण और पीपल-तुलसी की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि हरियाली अमावस्या के दिन व्रत रखने और पौराणिक कथा सुनने से घर में सुख-समृद्धि आती है।
हरियाली अमावस्या का धार्मिक महत्व
हरियाली अमावस्या प्रकृति और धार्मिक आस्था से जुड़ा पर्व है। इस दिन पौधे लगाने की परंपरा भी देखने को मिलती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पौधरोपण करने से घर-परिवार में सकारात्मकता और सुख-समृद्धि आती है।
इस दिन स्नान, दान और ध्यान के साथ भगवान की आराधना करना शुभ माना जाता है। ज्योतिषीय और धार्मिक मान्यताओं में हरियाली अमावस्या पर कथा सुनने का भी विशेष महत्व बताया गया है।
हरियाली अमावस्या की पौराणिक कथा
हरियाली अमावस्या से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक राज्य में राजा की बहू ने एक दिन छिपकर मिठाई खा ली। इसके बाद उसने मिठाई खाने का आरोप घर के चूहे पर लगा दिया।
चूहे को जब इस बात का पता चला तो उसने बदला लेने का फैसला किया। एक दिन जब घर में मेहमान ठहरे हुए थे, तब चूहे ने राजा की बहू की साड़ी उठाकर राजा के कमरे में रख दी।
राजा ने बहू को समझ लिया दोषी
अगली सुबह राजा को अपने कमरे में बहू की साड़ी मिली। राजा ने बिना पूरी सच्चाई जाने बहू को ही दोषी मान लिया। इसके बाद उन्होंने बहू को महल से बाहर निकाल दिया।
महल से बाहर निकलने के बाद बहू पीपल के पेड़ के नीचे रहने लगी। वह हर शाम पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाती थी। इसके साथ ही वह ज्वार उगाती और लोगों को गुड़धानी का प्रसाद बांटती थी।
दीपकों ने सैनिकों को बताई सच्चाई
कथा के अनुसार, एक रात राजा के कुछ सैनिकों ने पीपल के पेड़ के नीचे जल रहे दीपकों को आपस में बात करते हुए सुना। सैनिकों ने जब दीपकों से बातचीत की तो उन्हें पूरी घटना की सच्चाई पता चली।
दीपक ने बताया कि मिठाई वास्तव में राजा की बहू ने खाई थी, लेकिन साड़ी चूहे ने राजा के कमरे में रखी थी। इस तरह बहू पर लगाया गया आरोप गलत था और वह साड़ी वाली घटना में निर्दोष थी।
राजा को हुई अपनी गलती का अहसास
सैनिकों से पूरी सच्चाई जानने के बाद राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने अपनी बहू को सम्मान के साथ वापस महल बुला लिया।
इसके बाद परिवार में फिर से खुशी लौट आई और सभी लोग मिल-जुलकर रहने लगे। हरियाली अमावस्या की इस कथा को सत्य की जीत और गलत निर्णय के बाद सच्चाई सामने आने की सीख से भी जोड़ा जाता है।
हरियाली अमावस्या पर कैसे करें पूजा?
हरियाली अमावस्या के दिन सुबह पवित्र नदी या घर पर स्नान करके पूजा की शुरुआत की जाती है। इसके बाद सूर्य देव को जल अर्पित कर मंदिर में दीपक जलाने की परंपरा है।
इसके बाद पीपल और तुलसी के पौधे की पूजा करके उनकी परिक्रमा की जाती है। सुहागिन महिलाएं लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना से हरी चूड़ियां, सिंदूर और बिंदी बांटती हैं।
पितरों की शांति के लिए दान और तर्पण
हरियाली अमावस्या पर पितरों की शांति के लिए दान-पुण्य और तर्पण करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, अमावस्या तिथि पर पितरों को याद कर श्रद्धापूर्वक किए गए कर्मों का विशेष महत्व माना जाता है।
इस दिन पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से नए पौधे लगाना भी शुभ माना गया है।
मालपुए का भोग लगाने की मान्यता
हरियाली अमावस्या की पूजा में मालपुए का भोग लगाने की परंपरा भी बताई गई है। पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठान के बाद प्रसाद के रूप में इसे ग्रहण किया जाता है।
ध्यान रखें
हरियाली अमावस्या से जुड़ी पूजा और कथा धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा की विधि और परंपराओं में अंतर हो सकता है।
