“लड़की से सगाई करो और एचसीएस बनो?”
एचपीएससी के मेम्बर और चेयरमैन मुफ्त में बदनाम या ऊपर से तय होती है लिस्ट?
एचपीएससी के मेम्बर और चेयरमैन मुफ्त में बदनाम या ऊपर से तय होती है लिस्ट?
गुस्ताखी माफ हरियाणा – पवन कुमार बंसल
“मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए” की तर्ज पर आज यह चर्चा आम है कि हरियाणा पब्लिक सर्विस कमीशन बदनाम हुआ नेताओं के लिए। सवाल यह है कि क्या सचमुच हमाम में सब नंगे हैं? क्या इंटरव्यू में मेरिटोरियस कैंडिडेट्स का गला काटा जाता है?
हरियाणा सिविल सेवा (HCS) की परीक्षाओं को लेकर समय-समय पर तरह-तरह की चर्चाएं होती रही हैं। आरोप लगते रहे हैं कि लिखित परीक्षा पास करने के बाद असली खेल इंटरव्यू में होता है। कहा जाता है कि जिन्हें अच्छे अंक देने होते हैं, उनकी सूची ऊपर से आती है और उसी हिसाब से मेम्बर नंबर देते हैं। ऐसे में चेयरमैन और मेम्बर मुफ्त में बदनाम होते हैं या वाकई सिस्टम पर दबाव होता है—यह बड़ा सवाल है।
पूर्व मुख्यमंत्री Manohar Lal Khattar के कार्यकाल में एक इंटरव्यू में कथित रूप से पूछा गया सवाल चर्चा में रहा—“राजनीति के उस संत का नाम बताइए जिसने ‘बिन पर्ची, बिन खर्ची’ नौकरी दी।”
इसी तरह Om Prakash Chautala के मुख्यमंत्री रहते इंटरव्यू में पूछा जाने वाला सवाल भी चर्चाओं में रहा—“उस नेता का नाम बताइए जिसने अपना ताज वी.पी. सिंह के सिर पर रखा।”
और जब Bhupinder Singh Hooda मुख्यमंत्री थे, तब कथित तौर पर पूछा गया—“संविधान सभा के जीवित सदस्य का नाम बताइए (रणबीर सिंह)।”
इसी दौर में हूडा सरकार ने आईएएस बिड़लान को कमीशन का मेम्बर बनाया। याद दिला दें कि तीन दशक पहले डबवाली के डीएवी स्कूल के समारोह में आग लगने से लगभग 400 लोगों—जिनमें बच्चे और महिलाएं शामिल थीं—की दर्दनाक मौत हुई थी। उस समय बिड़लान सिरसा के डीसी और समारोह के मुख्य अतिथि थे। यह प्रकरण आज भी लोगों की स्मृति में है।
कहा तो यहां तक जाता है—“लड़की का रिश्ता लो और एचसीएस बनो।” आरोप है कि एक वीआईपी ने अपनी बेटी की सगाई एक ऐसे उम्मीदवार से की, जिसने एचसीएस की लिखित परीक्षा पास की थी, यह आश्वासन देकर कि इंटरव्यू में पास करवा दिया जाएगा—और वह पास भी हो गया।
जनचर्चा है कि “चिकन ऊपर वाले खाते हैं और मेम्बरों को तो बची-खुची हड्डियां ही मिलती हैं।” यदि कोई गंभीर रिसर्च करे तो पता चलेगा कि कितने नेताओं और अफसरों के साले-दामाद एचसीएस बने।
कहने को बहुत कुछ है—पूरी किताब लिखी जा सकती है। फिलहाल, समझदार को इशारा काफी है।
