फ्लैशबैक: जब हरियाणा में खाकी… जाति की रेखाओं में बंट गई थी 

गुस्ताख़ी माफ़ हरियाणा- ✍️ पवन कुमार बंसल!

फ्लैशबैक: जब हरियाणा में खाकी जाति की रेखाओं में बंट गई थी 
करीब 40 साल पहले हरियाणा में कानून की रखवाली करने वाली खाकी वर्दी खुद कटघरे में खड़ी नजर आई—जाति, दबदबे और मनमानी के बोझ तले बंटी हुई।
इस कहानी के केंद्र में था भोंडा कलां (गुरुग्राम) का तत्कालीन SHO रामफल। आरोप गंभीर थे—कानून लागू करने के बजाय उसे अपने हिसाब से मोड़ना, बेगुनाहों को फंसाना और वसूली करना।
मामला तब भड़का जब विजिलेंस के तत्कालीन एसपी आर.एस. राजन ने छापा मारने का आदेश दिया। लेकिन कानून के आगे झुकने के बजाय बगावत सामने आई। आरोप है कि रामफल ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकालकर टीम को धमकाया और मौके से मोटरसाइकिल पर फरार हो गया। बाद में सरकारी रिकॉर्ड में उसे गुरुग्राम में “ड्यूटी पर” दिखाया गया—मानो कहानी को पहले ही नया रूप दिया जा चुका हो।
फिर आया पलटवार।
रामफल ने अपने ही थाने में विजिलेंस डीएसपी चंदरभान के खिलाफ केस दर्ज करवा दिया—पत्नी से छेड़छाड़ और धमकी देने का आरोप लगाते हुए। बताया जाता है कि यह कदम एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की सलाह पर उठाया गया। देखते ही देखते पूरा मामला उलट गया—भ्रष्टाचार की जांच को साजिश बताया गया और रामफल खुद को पीड़ित साबित करने में जुट गया।
इसके बाद पुलिस महकमा ही दो हिस्सों में बंट गया—सिर्फ रैंक के आधार पर नहीं, बल्कि जाति के आधार पर भी। रामफल ने खुद को दलित बताकर निशाना बनाए जाने का आरोप लगाया, और एक आंतरिक अनुशासनात्मक मामला जातीय तनाव का रूप लेने लगा।
लेकिन कहानी का सबसे भयावह अध्याय अभी बाकी था।
आरोप है कि छापे से बौखलाए रामफल ने बाद में पुलिस टीम के साथ शिकायतकर्ता के घर पर धावा बोला। वहां जो हुआ, वह खाकी पर एक गहरा दाग बन गया—परिवार के सदस्यों, यहां तक कि महिलाओं के साथ मारपीट, तीन लोगों को घसीटकर थाने ले जाना, हिरासत में यातना देना और एक ऐसे हत्या के केस में फंसा देना जो असल में था ही नहीं।
आखिरकार मामला ढह गया—क्योंकि वह गढ़ा हुआ था।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। ज़िंदगियां टूट चुकी थीं, जनता का भरोसा दरक चुका था और वर्दी की साख पर गहरी चोट लग चुकी थी।
यह सिर्फ एक बेलगाम अफसर की कहानी नहीं थी। यह उस सिस्टम का आईना था, जहां ताकत सच को दबा सकती है, रिकॉर्ड बदले जा सकते हैं और जाति, कमान की एकता को भी तोड़ सकती है।
दुमछला आई
जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो इंसाफ के लिए दरवाज़ा किसके पास खटखटाये?
(यह लेखक की रिपोर्टिंग पर आधारित एक चर्चित कहानी रही, जो प्रमुख पत्रिका “सन वीकली” में प्रकाशित हुई थी।)

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