आपातकाल के लोकतंत्र सेनानियों को मिला सम्मान
राजस्थान की भजनलाल सरकार ने खोला पेंशन का रास्ता — करणीदान सिंह राजपूत के प्रयास हुए सफल
ऐलनाबाद (एम.पी. भार्गव)।आपातकाल (1975-77) जैसे भारतीय लोकतंत्र के सबसे काले दौर में तानाशाही के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले और जेल की सलाखों के पीछे रहे लोकतंत्र सेनानियों को आखिरकार उनका हक मिल गया है। राजस्थान की भजनलाल शर्मा सरकार ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए पहली बार सीआरपीसी की धाराओं के तहत गिरफ्तार किए गए लोकतंत्र सेनानियों को भी पेंशन और चिकित्सा सहायता देने की मंजूरी दे दी है।
अब तक यह सम्मान निधि सिर्फ मीसा और डीआईआर अधिनियमों के तहत बंद रहे सेनानियों तक सीमित थी। हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने इस श्रेणी का विस्तार करते हुए सीआरपीसी बंदियों को भी शामिल करने का मार्ग प्रशस्त किया था। लेकिन कई फाइलें वर्षों से लंबित थीं, जिनमें श्रीगंगानगर जिले की फाइलें जुलाई 2018 से विचाराधीन थीं।
करणीदान सिंह राजपूत के प्रयास आए रंग
सूरतगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार करणीदान सिंह राजपूत इस मुद्दे पर लगातार संघर्ष कर रहे थे। उनके अथक प्रयासों और शासन-प्रशासन से लगातार संवाद के बाद अंततः यह बड़ा निर्णय सामने आया है।
अब सीआरपीसी बंदियों को भी हर माह लोकतंत्र सेनानी सम्मान पेंशन और स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ मिलेगा।
श्रीगंगानगर जिले के 12 सेनानियों को सूची में शामिल किया गया
जिले से कुल 12 लोकतंत्र सेनानियों की पहचान की गई है, जिनमें सबसे अधिक 7 सूरतगढ़ से हैं।
इनमें शामिल हैं—
सरदार गुरनाम सिंह
सरदार हरचंद सिंह सिद्धू
करणी दान सिंह राजपूत
मुरलीधर उपाध्याय
घनश्याम शर्मा
दिवंगत हरिराम चिनिया की पत्नी लक्ष्मी देवी
दिवंगत हनुमान पुरी की पत्नी गुड्डी देवी
अब ये सभी राज्य सरकार की लोकतंत्र सेनानी पेंशन योजना के तहत पेंशन व चिकित्सा सुविधाएं प्राप्त करेंगे।
जिला कलेक्टर डॉ. मंजू की भूमिका सराहनीय
इस निर्णय को लागू करने में श्रीगंगानगर की जिला कलेक्टर डॉ. मंजू ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने स्वयं अभिलेखों की जांच और सत्यापन कार्य को आगे बढ़ाया। वर्षों पुराने रिकॉर्ड खंगालकर पात्र व्यक्तियों की पहचान सुनिश्चित की गई, ताकि कोई भी योग्य सेनानी इस सम्मान से वंचित न रहे।
“लोकतंत्र सेनानियों का सम्मान नैतिक कर्तव्य” — शिक्षा मंत्री
शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने कहा कि लोकतंत्र सेनानियों का सम्मान करना केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं बल्कि राष्ट्र का नैतिक दायित्व है।
उन्होंने कहा, “सरकार का उद्देश्य है कि कोई भी सच्चा सेनानी इस सम्मान निधि से वंचित न रहे।”
ऐतिहासिक और नैतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह निर्णय न केवल न्यायसंगत है बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। यह उन गुमनाम सेनानियों का सम्मान है जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के लोकतंत्र की रक्षा के लिए आवाज उठाई थी।
साथ ही यह संदेश भी देता है कि देशहित में किया गया कोई भी संघर्ष व्यर्थ नहीं जाता।
राजस्थान सरकार का यह कदम लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने और आपातकाल की स्मृतियों को सम्मान देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
