“भारत मां की वेदना को शब्दों में ढालती दिव्या गुप्ता की कविता”

तिजारा की बेटी दिव्या गुप्ता 'मीरा' की रचना ने झकझोरा मन-मस्तिष्क

खैरथल, अलवर। तिजारा की मूल निवासी और वर्तमान में खैरथल में निवास कर रही दिव्या गुप्ता ‘मीरा’ द्वारा रचित एक मार्मिक कविता “भारत मां भी रो पड़ी” ने समाज की कड़वी सच्चाइयों और विसंगतियों को बेबाकी से उजागर किया है। इस कविता में न केवल देश की वर्तमान स्थितियों पर सवाल उठाए गए हैं, बल्कि भारत मां की पीड़ा को भी भावनात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है।

कविता का भाव – समाज की कड़वी हकीकत पर करारा प्रहार
दिव्या गुप्ता ने अपनी कविता के माध्यम से दिखाया कि यह दुनिया जहां रंगीन नजर आती है, वहीं इसके भीतर अनेक दर्दनाक सच्चाइयाँ छुपी हैं। कविता की पंक्तियाँ जैसे – “ना पाक दुनिया के, ना साज दुनिया के। बे खौफ दुनिया के, मगरूर दुनिया के।” – सीधे-सीधे इस पाखंडी समाज पर व्यंग्य करती हैं।

आतंक, लाचारगी और अन्याय का चित्रण
कविता में कई लाचारों, किसानों, मजदूरों की हालत पर संवेदना प्रकट की गई है। समाज में फैले भय, राजनीतिक स्वार्थ, और बालिकाओं के प्रति बढ़ती संवेदनहीनता को बड़े ही प्रभावशाली शब्दों में चित्रित किया गया है –
“कायनात में आने से पहले ही, कयामत कर दी। ऐसा कहा तौबा तौबा, न हो जाए लड़की।”

भारत मां की पीड़ा – अंतर्मन को झकझोरती अंतिम पंक्तियाँ
कविता के अंत में ‘मीरा’ की कलम भारत मां के दुख को स्वर देती है –
“जख्म बन ना जाए नासूर, लगा दो अभी जड़ी। यह कहते-कहते….. भारत मां की आंखें भी रो पड़ी।।”
यह पंक्तियाँ पाठक के हृदय में गहरी छाप छोड़ती हैं और एक आत्मचिंतन की स्थिति उत्पन्न करती हैं।

दिव्या की लेखनी बनी आवाज़ – समाज को आईना दिखाने वाली रचना
दिव्या गुप्ता ‘मीरा’ ने अपनी कलम से न सिर्फ समाज को आईना दिखाया है, बल्कि उन सवालों को भी उठाया है जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। कविता की हर पंक्ति में एक गहरी पीड़ा, संवेदना और साहसिकता देखने को मिलती है, जो उनके लेखन को विशिष्ट बनाती है।

“भारत मां भी रो पड़ी” केवल एक कविता नहीं, बल्कि आज के समाज की सच्ची तस्वीर है। यह कविता हमें सोचने को मजबूर करती है कि क्या हम वाकई एक न्यायपूर्ण और संवेदनशील समाज की ओर बढ़ रहे हैं, या फिर अंधेरे में डूबती संवेदनाएं हमारी पहचान बनती जा रही हैं।

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