अरावली नष्ट करना मतलब जिस पेड़ पर मनुष्य ख़ुद को सुरक्षित मानता है उसी को जड़ से काटना- अरावली खदान नहीं प्रकृति की सौग़ात हैं

गुस्ताखी माफ़ हरियाणा – पवन कुमार बंसल

अरावली : खदान नहीं, सौगात है 

अरावली नष्ट करना मतलब जिस पेड़ पर मनुष्य ख़ुद को सुरक्षित मानता है उसी को जड़ से काटना – अरावली खदान नहीं प्रकृति की सौग़ात हैं

अरावली पर्वतमाला का नाज़ुक पारिस्थितिक तंत्र आज ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ लिए गए नीतिगत और कानूनी निर्णय केवल वर्तमान पीढ़ी नहीं, बल्कि आने वाली सदियों की दिशा तय करेंगे। हाल ही में माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली की परिभाषा को लेकर दिए गए दृष्टिकोण—विशेषतः 100 मीटर ऊँचाई को एक मानक के रूप में देखने की प्रवृत्ति—ने इस बहस को और गहन बना दिया है।
यह स्पष्ट है कि न्यायालय का उद्देश्य प्रशासनिक अस्पष्टता को कम करना और कानूनी स्पष्टता लाना है। किंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि अरावली को केवल ऊँचाई के पैमाने से न आँका जाए। अरावली की पारिस्थितिक पहचान उसकी ऊँचाई से नहीं, बल्कि उसकी भू-आकृतिक संरचना, जल-संग्रह क्षमता, जैव विविधता और मरुस्थलीकरण रोकने की भूमिका से निर्धारित होती है।
100 मीटर ऊँचाई को परिभाषा का आधार बनाना व्यावहारिक रूप से उन विशाल भूभागों को अरावली की परिधि से बाहर कर सकता है, जो भले ही अपेक्षाकृत कम ऊँचाई के हों, परंतु भूजल पुनर्भरण, वर्षा जल संचयन, वनस्पति संरक्षण और स्थानीय जलवायु संतुलन में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसका सीधा अर्थ यह होगा कि अनेक पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र कानूनी संरक्षण से वंचित हो सकते हैं।

“पर्यावरण है तो हमारा वजूद है”—यह कोई भावनात्मक वक्तव्य नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और सभ्यतागत सत्य है। अरावली केवल पर्वतों की शृंखला नहीं है; यह उत्तरी भारत के जल-तंत्र, कृषि-संतुलन और जीवन-रेखा की आधारशिला है। इसकी उपेक्षा का परिणाम गिरते भूजल स्तर, बढ़ते तापमान और तेज़ी से फैलते मरुस्थलीकरण के रूप में पहले ही दिखाई देने लगा है।

दुर्भाग्यवश, अल्पकालिक आर्थिक लाभ और संसाधन-केंद्रित सोच के कारण अरावली को संरक्षण की धरोहर के बजाय दोहन की वस्तु के रूप में देखा गया है। यह वही स्थिति है, जिसे कालिदास के उस रूपक से समझा जा सकता है—जिस टहनी पर बैठकर मनुष्य स्वयं को सुरक्षित मानता है, उसी को जड़ से काटने का प्रयास।

आज की युवा, शिक्षित और जागरूक कही जाने वाली पीढ़ी के लिए यह आत्ममंथन का समय है कि क्या विकास की परिभाषा इतनी संकीर्ण होनी चाहिए कि वह अपनी ही प्राकृतिक नींव को कमजोर कर दे। माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्णय हमें यह स्मरण कराते हैं कि कानून केवल प्रशासनिक सुविधा का साधन नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के प्रति नैतिक उत्तरदायित्व भी है।
यदि हम आज आँखें मूँद लेते हैं, चुप रहते हैं या इसे तकनीकी परिभाषाओं का विषय मानकर टाल देते हैं, तो इसके दुष्परिणाम हमारी नहीं, बल्कि आने वाली सैकड़ों पीढ़ियों की नियति बनेंगे।

आवश्यक है कि अरावली को खदान नहीं, बल्कि एक अमूल्य सौगात के रूप में देखा जाए—और उसकी पहचान ऊँचाई की सीमाओं से नहीं, बल्कि उसके पारिस्थितिक कार्यों से तय की जाए। विकास और संरक्षण के बीच टकराव नहीं, बल्कि संतुलन ही स्थायी समाधान है।
समय अभी भी शेष है, किंतु निर्णयों में दूरदृष्टि और दृष्टिकोण में संवेदनशीलता अनिवार्य होगी। अन्यथा इतिहास हमें उस पीढ़ी के रूप में याद रखेगा, जिसने सब कुछ जानते हुए भी मौन को चुना।

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