सावधान: जीएसटी सुधार की आड़ में आम उपभोक्ता पर नया बोझ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिले से अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में जीएसटी प्रणाली में सुधार की घोषणा की। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य जीएसटी कलेक्शन को वर्तमान ₹1.95 लाख करोड़ प्रतिमाह से बढ़ाकर ₹2.25 लाख करोड़ प्रतिमाह करना है। यह घोषणा उत्साहजनक अवश्य है, लेकिन इसके निहितार्थ पर गौर करें तो तस्वीर कुछ और ही संकेत देती है।

जीएसटी लागू होने के सात वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस दौरान केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व संतुलन बनाए रखने के लिए जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर (Compensation Cess) लगाया गया था। अब यह व्यवस्था समाप्त हो रही है, जिससे सरकार को सालाना लगभग ₹12,000 करोड़ का घाटा उठाना पड़ेगा।

वहीं, केंद्र ने अपने लक्ष्य में हर माह अतिरिक्त ₹30,000 करोड़ की वसूली का संकेत दिया है। यानी कुल मिलाकर सरकार को कर संरचना से अधिकतम वसूली के रास्ते तलाशने होंगे।

जीएसटी में फिलहाल चार प्रमुख स्लैब हैं: 5%, 12%, 18% और 28% है। सबसे संतुलित स्लैब 12% है, जिसमें रोज़मर्रा की कई वस्तुएँ आती हैं। अगर इसे हटा दिया गया तो कुछ वस्तुएँ 5% में जाएँगी (थोड़ी राहत), लेकिन ज़्यादातर को 18% स्लैब में डाल दिया जाएगा। इसका सीधा असर उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा।

राजस्व बढ़ाने के लिए 40% का नया स्लैब बनाकर “लक्ज़री” और “हाई डिमांड” वस्तुओं को महंगे स्लैब में डालना सरकार के लिए आसान है। कार, बाइक, सीमेंट, फ्रिज, एसी और तंबाकू उत्पादों को इसमें लाए जाने की चर्चा है। इससे इन उत्पादों की कीमतें और बढ़ जाएँगी।

नए उपकर या सेस की संभावना संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। “कंपनसेशन सेस” खत्म होने के बाद सरकार कोई नया “ग्रीन सेस” या “इंफ्रास्ट्रक्चर सेस” जैसी व्यवस्था ला सकती है। इसका बोझ भी अंततः उपभोक्ता पर ही पड़ेगा।

अगर 12% स्लैब समाप्त हुआ और 40% का नया स्लैब लागू हुआ तो रोज़मर्रा के उत्पाद महँगे होंगे क्योंकि 18% टैक्स देना पड़ेगा। बाइक, कार, सीमेंट, एसी-फ्रिज जैसे सामान आम आदमी की पहुँच से और दूर हो जाएँगे। महँगाई का दबाव बढ़ेगा और इसका असर समूची अर्थव्यवस्था पर दिखाई देगा।

जीएसटी सुधार की घोषणा स्वागत योग्य है, लेकिन अनुभव बताता है कि “सरलीकरण” के नाम पर कर संरचना का बोझ हमेशा आम उपभोक्ता पर ही पड़ा है। आने वाले महीनों में सरकार किस दिशा में कदम उठाती है यह देखना बाकी है, परन्तु संकेत साफ़ है कि राजस्व बढ़ाने की कीमत जनता की जेब से ही वसूली जाएगी।

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