अमेरिका को अपने हर फैसले वापस लेने पड़ रहे हैं….

गुस्ताखी माफ हरियाणा – पवन कुमार बंसल

सतीश मेहरा के सौजन्य से.. इतिहास गवाह है कि भारत पर दबाव के फैंसले हर बार अमेरिका को वापस लेने पड़े हैं

देश के लोगों का मानना है कि अमेरिका जल्द ही टैरिफ कम करने जा रहा है। यहां तक कि देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार भी अनंत नागेश्वर ने उम्मीद जताई है कि अमेरिका 25% टैरीफ नवंबर के अंत तक वापस ले सकता है। वे यह भी दावा कर रहे हैं कि दोनों सरकारों के बीच बातचीत शुरू हो चुकी है। बातचीत शुरू हुई है या कब तक आगे बढ़ेगी यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन इस समय स्थिति देशवासियों के खुश होने जैसी भी नहीं है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप है कि बार-बार भारत को चुटकी से नहीं बल्कि चिमटे से काटे जा रहे हैं जब भी डोनाल्ड ट्रंप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना अच्छा दोस्त बताते हैं या जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हैं, तभी देश को किसी न किसी आपत्ति में डाले जा ‌रहे हैं और हम अपनी जनता को समझाने निकल पड़ते हैं।

देश की सरकार को अपनी कूटनीति, विदेश नीति और व्यापार नीति में कौशलता और सूझबूझ बरतने की जरूरत है। जिस प्रकार से ऐसी परिस्थितियों में हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री ने बरती थी ।डोनाल्ड ट्रंप लगातार भारत को जख्म दे रहे हैं । अमेरिका का राष्ट्रपति बनते ही ट्रंप ने भारतीय अवैध प्रवासियों को अमेरिका से बुरी तरह बेइज्जत करके निकाला और फिर ऑपरेशन सिंदूर रुकवाने का बार-बार श्रेय लेकर भारत को नीचा दिखाने की कोशिश की गई। पाकिस्तान के रक्षा प्रमुख असीम मुनीर को खाने पर आमंत्रित करना, पाकिस्तान को आईएमएफ से फंडिंग की स्वीकृति दिलवाना और पाकिस्तान के साथ लगातार गलबहियां किया जाना भी भारत को अमेरिका से दूर करना है।इसके बाद भारत को 50 प्रतिशत टैरीफ का टीका लगाकर दर्द दिया गया उससे लगता है कि अमेरिका भारत के साथ दुश्मनी निभा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप यही नहीं रुके ईरान के चाबहार पोर्ट के लिए 2018 में दी गई छूट को वापस लेने के आदेश भी दिए हैं इसका भारत पर बुरा ही असर पड़ने वाला है। ट्रंप के आदेश के अनुसार चाबहार का संचालन करने वाले व्यक्तियों और कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंध झेलने पड़ेंगे ।बाकी रही कसर अमेरिका ने भारत पर H-1B वीजा की दर बढा कर निकाल दी। अब कर्मचारी व कामगार वर्ग में में अफरा तफरी मची है। इसी बीच दिल्ली दिल्ली से न्यूयॉर्क का एक तरफ का फ्लाइट का किराया 37000 रुपए से बढ़कर 90000 रुपए तक हो गया है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से H-1B वीजा पर आवेदन शुल्क एक लाख गुना तक बढ़ा दिया गया है। आदेश के बाद भारत और अमेरिका के बीच रोजगार और तकनीकी क्षेत्र में एक नई चुनौती पैदा हो गई है। यह फैसला उन नए वीजा आवेदनों पर लागू होगा जो आगामी वीजा लॉटरी चक्र में आने वाले हैं, जबकि मौजूदा वीजा धारकों और उनके नवीनीकरण पर इसका असर नहीं पड़ेगा। भारतीय दूतावास ने इस पृष्ठभूमि में तत्काल सहायता के लिए एक आपातकालीन नंबर जारी किया है, जिससे H-1B वीजा से जुड़े भारतीय नागरिकों को जरूरी मदद मिल सके। साथ ही, भारत सरकार और उद्योग जगत इस कदम के प्रभावों का गहराई से अध्ययन कर रहे हैं। इस फैसले पर पूर्व भारतीय राजनयिकों ने भी चिंता जताई है, उन्होंने कहा कि यह कदम खास तौर पर तकनीकी क्षेत्रों में कार्यरत भारतीय पेशेवरों के लिए चुनौतीपूर्ण होगा क्योंकि अधिकांश H-1B वीजा धारक भारत से हैं। H-1B वीजा के नियमों में बदलाव से 2,00,000 से ज्यादा भारतीय प्रभावित होंगे। साल 2023 में H-1B वीजा लेने वालों में 1,91,000 लोग भारतीय थे। ये आंकड़ा 2024 में बढ़कर 2,07,000 हो गई। भारत की आईटी/टेक कंपनियां हर साल हजारों कर्मचारियों को H-1B पर अमेरिका भेजती हैं।
इतिहास पर गौर करें तो जब जब भी भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुए हैं तब तब अमेरिका ने भारत पर आर्थिक, व्यापारिक व सामरिक कई तरह के दबाव बनाने की कोशिश की है। बात 1965 की है। तब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे। उस वक्त भारत और पाकिस्तान के बीच जंग छिड़ी थी। उस दौरान, भारत गंभीर रूप से खाद्य संकट से जूझ रह था। अमेरिका तब एक स्कीम के तहत भारत में‌ अनाज भेज रहा था। अचानक वह भारत पर जंग खत्म करने के लिए दबाव बनाने लगा। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने यह तक धमकी दे डाली कि अगर युद्ध नहीं रोका तो हम गेहूं देना बंद कर देंगे। तब प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कहा कि आप गेहूं देना बंद कीजिये, हम अपने आत्मसम्मान से समझौता करने को तैयार नहीं हैं। इसी वक्त लाल बहादुर ने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया था। इसके साथ देशवासियों से एक दिन का उपवास रखने का भी अनुरोध किया था।
1971 की लड़ाई में भी अमेरिका पूरी तरह से पाकिस्तान के सपोर्ट में खड़ा था। उस वक्त भी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और राष्ट्रपति सलाहकार हेनरी किसिंजर के साथ काफी विवाद हुआ था। भारत-पाक युद्ध को रोकने के लिए अमेरिका ने हर तरह से कोशिश की। भारत पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका ने अपना नौसैनिक बेड़ा भी भेज दिया था। फिर भी भारत नहीं झुका क्योंकि रूस तब भारत के साथ खड़ा था। इसी तरह,भारत ने पाकिस्तान पर बड़ी जीत दर्ज की और बांग्लादेश का निर्माण कराया। 1974 में भी भारत ने पहली बार पोखरण-1 परमाणु परिक्षण किया था। तब भी इसे रोकने के लिए अमेरिका ने लगातार दबाव बनाने की कोशिश की। तब, अमेरिकी राष्ट्रपति ने इंदिरा गांधी के लिए अपशब्द तक कहे थे।
उस वक्त अमेरिका ने परमाणु ईंधन, तकनीकी और आर्थिक सहायता पर प्रतिबंध लगा दिए थे। हालांकि, तब भी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हार नहीं मानी। उन्होंने स्वदेशी तकनीकी विकास और नए पार्टनर्स के साथ अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखा।
साल 1998 में भारत ने पोखरण-2 परमाणु परिक्षण किया, जो अमेरिका को रास नहीं आई। बौखलाकर अमेरिका ने भारत पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगा दिए। इन प्रतिबंधों के तहत हथियारों की बिक्री पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई। विश्व बैंक जैसे संस्थानों से मिलने वाली आर्थिक मदद भी मिलनी बंद हो गई। इसके बावजूद, भारत पीछे नहीं हटा। तब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अमेरिका को जो करना है करे, हमारे देश के लिए परमाणु परिक्षण जरूरी है। क्योंकि पाकिस्तान और चीन जैसे पड़ोसी देश परमाणु संपन्न हैं।हालांकि, कुछ महीनों बाद अमेरिका को यह समझ आ गया कि भारत को दुनिया से अलग थलग करना सही नहीं है। साल 1999 तक ज्यादातर प्रतिबंध हटा दिए गए।‌ इसके बाद साल 2000 में अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत दौरे पर आए, जिसके बाद से फिर अमेरिका से संबंध ठीक हो गए। इतिहास बताता है कि जब-जब भी अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की है तो तत्कालीन नेतृत्व ने अमेरिका की परवाह किए बगैर भारत को कभी नीचा नहीं देखने दिया। वर्तमान नेतृत्व से भी यही अपेक्षा है कि पूर्व की तरह अपनी कूटनीति, विदेश नीति ,व्यापार नीति को मजबूत बनाने में अमेरिका के इतर दूसरे पार्टनर्स को जोड़कर और स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देकर नई राह पर चले। यदि देश का वर्तमान नेतृत्व ऐसा करने में सक्षम है तो, यह बात पक्की है फिर से अमेरिका को अपने भारत विरोधी फैसले वापस लेने पड़ेंगे।

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