जयपुर के प्रतिष्ठित विद्यालय नीरजा मोदी स्कूल की नन्ही छात्रा ने मात्र नौ वर्ष की उम्र में स्कूल की चौथी मंज़िल से गिरकर दी जान
जयपुर के प्रतिष्ठित विद्यालय नीरजा मोदी स्कूल की नन्ही छात्रा अमायरा जो चौथी कक्षा में पढ़ती थी। मात्र नौ वर्ष की उम्र में स्कूल की चौथी मंज़िल से गिरकर उसने अपनी जान दे दी।
यह घटना केवल एक परिवार को नहीं, पूरे समाज को चेतावनी दे रही है..
हम क्या वातावरण बना रहे हैं जहाँ एक मासूम मन इतनी पीड़ा में डूब जाता है?)
पूरे तंत्र को झकझोरने वाली हृदयविदारक घटना..
बदलता समय, दबाव से घिरा बचपन..उफ्फ शून्य हुआ जाता है मस्तिष्क..
आज हर माता-पिता का सपना है कि उनका बच्चा हर क्षेत्र में अव्वल आए।
परंतु इस चाह में हम यह भूल रहे हैं कि हर बच्चा अलग है, उसकी अपनी गति, अपनी प्रतिभा है।
बच्चों से अपेक्षाएँ बढ़ती जा रही हैं, पर संवाद घटते जा रहे हैं।
घर और स्कूल — दोनों जगह सफलता की दौड़ इतनी तेज़ है कि बचपन साँस ही नहीं ले पा रहा है। संवादहीनता .. मौन की दीवारें आसपास खिंची हुई हैं।
कामकाजी माता-पिता के पास समय नहीं, शिक्षक पर परिणाम का दबाव है, और बच्चे के मन में भय व अकेलापन है।
वह अपनी उलझनें कह नहीं पाता ..
डरता है कि कहीं उसे “कमज़ोर” न समझ लिया जाए।
इस मौन में उसकी आत्मा घुटती है, और यही घुटन कभी-कभी विनाशकारी बन जाती है। कब समझेंगे हम.. शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य अंक नहीं, अभिव्यक्ति हो..
शिक्षा का लक्ष्य केवल परीक्षा में सफलता नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाना हो।
हर बच्चा किसी न किसी क्षेत्र में प्रतिभावान होता है .. बस हमें उसे पहचानना और अवसर देना है।
विविध प्रतिभाओं का सम्मान ही समग्र विकास की कुंजी है।
खेलों से दोस्ती: खेल न केवल शरीर को स्वस्थ रखते हैं, बल्कि हार-जीत को सहजता से स्वीकारना सिखाते हैं।
यही बच्चों को मानसिक दृढ़ता प्रदान करते हैं।आज हम एन केन प्रकारेण केवल बच्चे की जीत चाहते हैं। उसने हार का स्वाद ही नहीं चखा.. हारने पर मानसिक दवाब झेलेगा।
नृत्य, संगीत और गायन से प्रेम:
संगीत भावनाओं का शुद्धतम रूप है।
यह बच्चे के मन की बेचैनी को शांति देता है, आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम बनता है और तनाव को कम करता है।
कलात्मक और रचनात्मक गतिविधियाँ जरूरी हैं।
चित्रकला, नृत्य, नाटक, लेखन या कोई भी सृजनात्मक कार्य बच्चे की कल्पना को पंख देता है।
रचनात्मकता तनाव को ऊर्जा में बदल देती है।
अन्य रुचियाँ और शौक़:
प्रकृति से लगाव,पशु पक्षी से प्रेम, पढ़ना-लिखना, तकनीकी कौशल, सामाजिक कार्य
हर रुचि में आत्मविश्वास छिपा है।
बच्चे को उसके पसंदीदा क्षेत्र में प्रोत्साहन देना, मानसिक स्वास्थ्य का सबसे सुंदर उपाय है।
मानसिक स्वास्थ्य पर खुला संवाद आवश्यक है।
यदि बच्चा उदास है, चिंतित है या गुस्से में है, तो यह “नखरा” नहीं उसे आपका समय चाहिए।यह संकेत है कि उसे आपकी समझ और सहानुभूति चाहिए।
काउंसलिंग, मनोवैज्ञानिक सहायता और भावनात्मक शिक्षा को स्कूलों में अनिवार्य बनाना समय की माँग है। माता-पिता और समाज के लिए संदेश
बच्चों को यह महसूस कराइए कि वे “अंकों” से नहीं, “अस्तित्व” से मूल्यवान हैं।
उन्हें जीतना नहीं, जीना सिखाइए।
हर असफलता को सीख का अवसर मानिए।
हर दिन उनसे कहिए —
“तुम जैसे हो,वैसे ही अच्छे हो और मुझे प्यारे हो”
करुणा के पाठ लौटाइए..दादी नानी के किस्से कहानियों से उनके जीवन में रंग भर दीजिए।
अमायरा जैसी घटनाएँ हमें चेताती हैं कि अगर हमने अपने बच्चों से संवाद, स्नेह और संवेदना छीन ली — तो आने वाली पीढ़ियाँ खोखली हो जाएँगी।
हमें ऐसा समाज बनाना होगा जहाँ हर बच्चा बिना भय, बिना दबाव, अपनी
पहचान जी सके..हर बच्चा अपने आप में अनूठा है बस उसके भीतर बसे गीत को सही स्वर में गुनगुनाने के लिए अवसर दीजिए..उसके मन के रंगों को इंद्रधनुष बनाने के लिए प्रेरित कीजिए।
~ज्योत्सना सक्सेना
