Uttar Pradesh Cultural Heritage:  सातवीं सदी की गंगा प्रतिमा से प्रेम मंदिर तक, यूपी का गौरवशाली वैभव बयां कर रही प्रदर्शनी

ग्रेटर नोएडा, 28 सितंबर। उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो में प्रदेश की सदियों पुरानी कला, संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत को बेहद आकर्षक तरीके से प्रदर्शित किया गया है। इंडिया एक्सपो मार्ट में संस्कृति विभाग (Uttar Pradesh Cultural Heritage) की ओर से लगाए गए आउटलेट में सातवीं सदी की गंगा की प्रतिमा से लेकर दसवीं सदी की गरुणारूढ़ लक्ष्मी नारायण और 12वीं सदी की सरस्वती की मूर्ति तक को प्रदर्शित किया गया है। प्राचीन मूर्तियों, डिजिटल पांडुलिपियों, चित्रों और ऐतिहासिक स्थलों की प्रतिकृतियों के माध्यम से उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक यात्रा के अलग-अलग कालखंडों को सामने रखा गया है।

संस्कृति विभाग के इस आउटलेट को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। प्रदर्शनी में जहां प्राचीन मूर्तियां लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं, वहीं डिजिटल तकनीक के माध्यम से प्रदर्शित पांडुलिपियां नई पीढ़ी को पुरानी ज्ञान परंपरा से परिचित करा रही हैं। आउटलेट के मुख्य द्वार को प्रेम मंदिर के मुख्य द्वार और ब्रह्मांड द्वार की प्रतिकृति के रूप में तैयार किया गया है। इसकी भव्य संरचना आगंतुकों के लिए आकर्षक सेल्फी प्वाइंट बन गई है।

सातवीं से 12वीं सदी तक की मूर्तियां बनीं आकर्षण का केंद्र

प्रदर्शनी में उत्तर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों से प्राप्त प्राचीन प्रतिमाओं को प्रदर्शित किया गया है। इन मूर्तियों के माध्यम से प्रदेश की समृद्ध शिल्प परंपरा और विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों की सांस्कृतिक झलक देखने को मिलती है।

मिर्जापुर से प्राप्त दसवीं सदी की गरुणारूढ़ लक्ष्मी नारायण की मूर्ति प्रदर्शनी में विशेष आकर्षण बनी हुई है। इसके अलावा सुल्तानपुर से मिली 11वीं सदी की भगवान विष्णु की प्रतिमा, कानपुर के रानीपुर से प्राप्त दसवीं सदी की महेश्वर की मूर्ति और अल्मोड़ा से मिली 11वीं सदी की भगवान विष्णु की प्रतिमा भी लोगों का ध्यान खींच रही है।

गोरखपुर से प्राप्त 12वीं सदी की सरस्वती की मूर्ति को भी प्रदर्शनी में प्रमुखता से रखा गया है। वहीं, सातवीं सदी की गंगा की प्रतिमा भी आगंतुकों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

इन प्राचीन प्रतिमाओं के माध्यम से अलग-अलग कालखंडों में विकसित भारतीय शिल्पकला, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक जीवन की झलक प्रस्तुत की गई है। प्रदर्शनी में आने वाले विद्यार्थियों और युवाओं में इन प्राचीन धरोहरों को लेकर विशेष जिज्ञासा दिखाई दे रही है। कई युवा इन मूर्तियों के इतिहास, उनके निर्माण काल और सांस्कृतिक महत्व से जुड़ी जानकारी भी हासिल कर रहे हैं।

प्रेम मंदिर की प्रतिकृति बनी सेल्फी प्वाइंट

उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान में ब्रज क्षेत्र का विशेष स्थान है। इसी को ध्यान में रखते हुए प्रदर्शनी में ब्रज की सांस्कृतिक विरासत को भी प्रमुख स्थान दिया गया है। संस्कृति विभाग के आउटलेट के प्रवेश द्वार को प्रेम मंदिर के मुख्य द्वार और ब्रह्मांड द्वार की प्रतिकृति के तौर पर तैयार किया गया है।

प्रेम मंदिर की इस प्रतिकृति की भव्य संरचना आगंतुकों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। यहां आने वाले लोग इसके साथ तस्वीरें खींचते और सेल्फी लेते नजर आ रहे हैं। इस तरह यह प्रवेश द्वार प्रदर्शनी के सांस्कृतिक संदेश को सामने रखने के साथ-साथ आगंतुकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र भी बन गया है।

नई दिल्ली से प्रदर्शनी देखने पहुंचीं कक्षा 11 की छात्रा आयुषी ने बताया कि उन्होंने अब तक ऐसी प्राचीन मूर्तियों को पाठ्यपुस्तकों में तस्वीरों के रूप में ही देखा था। प्रदर्शनी में उन्हें इन ऐतिहासिक प्रतिमाओं को सामने से देखने का अवसर मिला।

आयुषी के अनुसार, इस तरह की प्रदर्शनियां विद्यार्थियों को भारतीय और सनातन संस्कृति को करीब से समझने में मदद करती हैं। प्राचीन प्रतिमाओं को प्रत्यक्ष रूप से देखने से विद्यार्थियों में इतिहास और संस्कृति को लेकर जिज्ञासा बढ़ती है।

 रसखान की समाधि से गोवर्धन तक सांस्कृतिक स्थलों की झलक

संस्कृति विभाग के आउटलेट में केवल प्राचीन मूर्तियों को ही स्थान नहीं दिया गया है, बल्कि उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थलों को भी अलग-अलग माध्यमों से प्रदर्शित किया गया है।

राज्य ललित कला अकादमी की ओर से विभिन्न चित्रकारों की कलाकृतियां भी यहां प्रदर्शित की गई हैं। इन चित्रों में प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ वर्तमान समय की कला को भी स्थान दिया गया है। प्रदर्शनी की एक खास बात यह है कि यहां चित्रकार मौके पर ही आगंतुकों के पोर्ट्रेट तैयार कर रहे हैं। इससे कला की प्रस्तुति और अधिक जीवंत हो गई है तथा आगंतुकों को कला सृजन की प्रक्रिया को करीब से देखने का अवसर मिल रहा है।

प्रदर्शनी में अलग-अलग कालखंडों से जुड़ी पांडुलिपियों को डिजिटल फ्रेम में प्रदर्शित किया गया है। डिजिटल तकनीक के माध्यम से पुरानी ज्ञान परंपरा और ऐतिहासिक सामग्री को नई पीढ़ी के सामने प्रस्तुत किया गया है। इससे युवा आधुनिक तकनीक के माध्यम से प्राचीन ज्ञान और ऐतिहासिक विरासत को देखने और समझने का अवसर पा रहे हैं।

इसके अलावा प्रदर्शनी में मथुरा के महावन स्थित रसखान की समाधि, गोवर्धन के कुसुंबा सरोवर और मिर्जापुर के सारनाथ मंदिर की प्रतिकृतियां भी तैयार की गई हैं। इन प्रतिकृतियों के माध्यम से प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े सांस्कृतिक स्थलों की जानकारी एक ही स्थान पर उपलब्ध कराई गई है।

प्राचीन धरोहरों से युवाओं को जोड़ने का प्रयास

प्रदर्शनी में प्राचीन मूर्तियों और सांस्कृतिक स्थलों के साथ डिजिटल माध्यम का इस्तेमाल भी किया गया है। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सामग्री को नई पीढ़ी के लिए अधिक सहज और आकर्षक बनाना है।

संस्कृति विभाग के प्राविधिक सहायक (संस्कृत) हरिश्चंद्र दुबे ने बताया कि प्राचीन संस्कृति से जुड़ी वस्तुओं को देखकर युवाओं में काफी उत्साह देखने को मिल रहा है। मूर्तियों, चित्रों और डिजिटल पांडुलिपियों को देखकर युवा उनके इतिहास और सांस्कृतिक महत्व से जुड़े सवाल पूछ रहे हैं।

उन्होंने बताया कि विभाग की ओर से आगंतुकों को इनसे संबंधित जानकारी दी जा रही है, ताकि नई पीढ़ी प्रदेश और देश की सांस्कृतिक विरासत को करीब से समझ सके। प्राचीन धरोहरों को आधुनिक प्रस्तुति के साथ सामने रखने से विद्यार्थियों और युवाओं की इसमें रुचि बढ़ रही है।

सदियों की सांस्कृतिक यात्रा एक मंच पर

उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो में संस्कृति विभाग का यह आउटलेट प्रदेश की सदियों पुरानी सांस्कृतिक यात्रा को एक ही मंच पर प्रस्तुत कर रहा है। सातवीं सदी की गंगा की प्रतिमा से लेकर दसवीं, 11वीं और 12वीं सदी की विभिन्न प्रतिमाएं प्रदेश की प्राचीन कला परंपरा की झलक दिखाती हैं।

वहीं, प्रेम मंदिर के मुख्य द्वार और ब्रह्मांड द्वार की प्रतिकृति ब्रज की सांस्कृतिक पहचान को सामने रखती है। रसखान की समाधि, गोवर्धन के कुसुंबा सरोवर और मिर्जापुर के सारनाथ मंदिर की प्रतिकृतियां प्रदेश के अलग-अलग सांस्कृतिक स्थलों से आगंतुकों को परिचित करा रही हैं।

डिजिटल पांडुलिपियों और आधुनिक चित्रकला के माध्यम से प्रदर्शनी ने प्राचीन विरासत और वर्तमान कला के बीच भी एक कड़ी प्रस्तुत की है। यही वजह है कि आउटलेट में आने वाले विद्यार्थियों, युवाओं और अन्य आगंतुकों के बीच प्राचीन मूर्तियों, चित्रों, पांडुलिपियों और प्रतिकृतियों को लेकर उत्सुकता बनी हुई है।

इस प्रदर्शनी के जरिए उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को केवल ऐतिहासिक धरोहर के रूप में नहीं, बल्कि नई पीढ़ी के लिए सीखने और समझने के अवसर के रूप में भी प्रस्तुत किया जा रहा है। प्राचीन प्रतिमाओं से लेकर डिजिटल पांडुलिपियों और आकर्षक प्रतिकृतियों तक, यहां उत्तर प्रदेश की कला, संस्कृति और गौरवशाली विरासत के विभिन्न पहलुओं को एक साथ देखने का अवसर मिल रहा है।

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