ग्राम पंचायत किरा की सफलता की कहानी

"गोबर से ऊर्जा, ऊर्जा से समृद्धि — आत्मनिर्भरता की ओर ग्राम पंचायत किरा की प्रेरक यात्रा"

  • आत्मनिर्भर भारत की सशक्त मिसाल

जब इच्छाशक्ति, दूरदृष्टि और जनभागीदारी एक साथ जुड़ते हैं, तब बदलाव केवल कल्पना नहीं, बल्कि वास्तविकता बन जाता है। जनपद रामपुर के विकास खण्ड शाहबाद की ग्राम पंचायत किरा ने इसी सोच को साकार करते हुए स्वच्छ ऊर्जा, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक आत्मनिर्भरता का ऐसा मॉडल विकसित किया है, जो आज पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा बन रहा है। मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश की मंशा के अनुरूप ग्राम पंचायत स्थित गौशाला में संरक्षित 769 गौवंशों से प्रतिदिन निकलने वाले लगभग 3,845 किलोग्राम गोबर को अब बेकार नहीं समझा जाता, बल्कि इसे विकास का आधार बनाया गया है। इसी उद्देश्य से यहां 85 घन मीटर क्षमता का आधुनिक बायोगैस प्लांट स्थापित किया गया, जिसने गांव की तस्वीर बदल दी।

एक दूरदर्शी निर्णय जिसने बदल दी गांव की दिशा
ग्राम प्रधान नीतू के नेतृत्व में पंचायत ने ऊर्जा संकट, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और अतिरिक्त आय के स्रोतों पर गंभीरता से विचार किया। परिणामस्वरूप स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) फेज-2 के अंतर्गत प्राप्त ₹40 लाख की धनराशि से बायोगैस प्लांट की स्थापना की गई।
प्लांट के संचालन के लिए प्रतिदिन लगभग 2,125 किलोग्राम गोबर की आवश्यकता होती है, जिसे ग्रामीणों के सहयोग से एकत्र किया जाता है। इस व्यवस्था ने गांव में स्वच्छता के प्रति नई जागरूकता पैदा की और गोबर को एक मूल्यवान संसाधन का दर्जा दिलाया।

गोबर से बिजली, बिजली से विकास
यह बायोगैस प्लांट प्रतिदिन लगभग 51 किलोग्राम बायोगैस का उत्पादन करता है। इस गैस से संचालित 15 केवीए जनरेटर के माध्यम से अब तक 25,200 यूनिट विद्युत का उत्पादन किया जा चुका है, जिसकी अनुमानित बाजार कीमत ₹2.52 लाख है।
इस स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग कई महत्वपूर्ण कार्यों में किया जा रहा है—
गौशाला में चारा मशीन संचालन।
गौशाला के सबमर्सिबल पंप चलाने में।
गांव की सड़कों एवं सार्वजनिक स्थलों की प्रकाश व्यवस्था में।
गौशाला के केयरटेकरों के लिए रसोई गैस उपलब्ध कराने में।
इस पहल से बिजली पर निर्भरता घटी है, संचालन लागत कम हुई है और पंचायत की बचत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

स्लरी बनी आय का नया स्रोत
बायोगैस प्लांट से निकलने वाली स्लरी उत्कृष्ट जैविक खाद है। ग्राम पंचायत ने इसे किसानों को उपलब्ध कराकर अब तक ₹53,800 की आय अर्जित की है। यह राशि पंचायत के वन सोर्स रेवेन्यू (OSR) खाते में जमा की गई है, जिसका उपयोग विकास कार्यों में किया जा रहा है।
इस प्रकार गांव में “कचरे से कमाई” का एक सफल और सतत मॉडल विकसित हुआ है।

अब सरसों से भी बढ़ेगी पंचायत की आय
बायोगैस परियोजना की सफलता से उत्साहित ग्राम पंचायत ने कोल्ड प्रेस ऑयल एक्सपेलर मशीन भी स्थापित की है। इसके माध्यम से गांव में उत्पादित सरसों से शुद्ध एवं रसायनमुक्त तेल तैयार किया जा रहा है।
इससे पंचायत को अतिरिक्त आय प्राप्त होगी और ग्रामीणों को शुद्ध, स्वास्थ्यवर्धक सरसों का तेल स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होगा।

पर्यावरण संरक्षण की अनूठी पहल
इस परियोजना से पर्यावरण संरक्षण को भी नई दिशा मिली है।
मीथेन गैस का नियंत्रित उपयोग होने से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम हुआ।
खुले में गोबर फैलने की समस्या में कमी आई।
जैविक खेती को बढ़ावा मिला।
डीजल आधारित ऊर्जा पर निर्भरता घटी, जिससे कार्बन उत्सर्जन में कमी आई।
यह पहल स्वच्छ, हरित और टिकाऊ विकास की उत्कृष्ट मिसाल बन चुकी है।

सामाजिक परिवर्तन की नई शुरुआत
बायोगैस प्लांट ने केवल ऊर्जा ही नहीं दी, बल्कि लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव भी लाया।
गौशाला में कार्यरत केयरटेकर श्री दिवाकर सहित कर्मचारियों को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध होने से लकड़ी और उपलों के धुएं से मुक्ति मिली। साथ ही गोबर संग्रहण, प्लांट संचालन, स्लरी प्रबंधन और तेल उत्पादन जैसे कार्यों से ग्रामीणों के लिए नए रोजगार के अवसर भी सृजित हुए।

चुनौतियों को अवसर में बदला
इस यात्रा में कई चुनौतियां भी सामने आईं—प्रारंभिक निवेश, तकनीकी जानकारी का अभाव और लोगों की झिझक। लेकिन पंचायत ने शासन की योजनाओं, विशेषज्ञों के मार्गदर्शन और निरंतर जनजागरूकता अभियान के माध्यम से इन सभी चुनौतियों को सफलता में बदल दिया।

आज प्रेरणा बन चुकी है ग्राम पंचायत किरा
ग्राम पंचायत किरा यह सिद्ध करती है कि यदि पंचायत नेतृत्व, जनभागीदारी और नवाचार एक साथ हों, तो कोई भी गांव आत्मनिर्भर बन सकता है।
आज यह पंचायत केवल बिजली नहीं बना रही, बल्कि स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, जैविक खेती, स्थानीय रोजगार और आर्थिक स्वावलंबन का नया अध्याय लिख रही है। यह मॉडल अन्य ग्राम पंचायतों के लिए भी अनुकरणीय है।

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