माटीकला योजना से संवरी किस्मत: 7.5 लाख के लोन से भूरा हुसैन ने खड़ा किया कुल्हड़ का बड़ा कारोबार, अब हर महीने कमा रहे 1.5 लाख रुपये
बड़ा गांव चौराहे पर लगाई 10 मशीनों की यूनिट, रोजाना 10 हजार कुल्हड़ का हो रहा उत्पादन
-खुद आत्मनिर्भर बनने के साथ गांव के 18 लोगों को दिया रोजगार, 10 दिन की विशेष ट्रेनिंग ने सिखाया मुनाफे का गणित
- रिपोर्ट: शाहबाज़ खान
रामपुर: उत्तर प्रदेश सरकार की ‘मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना’ पारंपरिक कारीगरों के लिए वरदान साबित हो रही है। रामपुर के बड़ा गांव चौराहा निवासी भूरा हुसैन इसके एक सशक्त उदाहरण हैं। कभी सीमित स्तर पर काम करने वाले भूरा आज इस योजना के तहत 7.5 लाख रुपये का ऋण लेकर कुल्हड़ निर्माण की एक बड़ी यूनिट चला रहे हैं। अपनी इस यूनिट में वह 10 अत्याधुनिक मशीनों और एक टनल के जरिए रोजाना 8 से 10 हजार कुल्हड़ तैयार कर रहे हैं। इससे न केवल उनकी मासिक आय 1 से 1.5 लाख रुपये तक पहुंच गई है, बल्कि उन्होंने अपने साथ-साथ 17 से 18 अन्य लोगों को भी स्थायी रोजगार मुहैया कराया है।
दोस्तों की सलाह से मिली नई राह
भूरा हुसैन बताते हैं कि उन्हें इस सरकारी योजना के बारे में खादी ग्रामोद्योग (पुनर्वास) से जुड़े अपने मित्रों से जानकारी मिली थी। मित्रों ने उन्हें एक अन्य स्थान पर चल रहा प्लांट दिखाया, जिसे देखकर वह बेहद प्रभावित हुए। इसके बाद उन्होंने योजना के तहत आवेदन कर दिया। करीब दो साल पहले (2024 में) उनका साढ़े सात लाख रुपये का ऋण पास हो गया, जिसके बाद उन्होंने बड़ा गांव चौराहे पर अपनी खुद की एक बड़ी यूनिट स्थापित की।
10 मशीनों और टनल से बढ़ा उत्पादन
शुरुआती संघर्ष के बाद भूरा हुसैन ने अपनी यूनिट को आधुनिक रूप दिया। वर्तमान में उनके कारखाने में कुल्हड़ बनाने वाली 10 मशीनें लगी हैं। इसके अलावा कच्चे माल को पकाने के लिए एक बड़ी टनल (भट्टी) भी स्थापित की गई है। इस सेटअप की मदद से वह प्रतिदिन आठ से दस हजार कुल्हड़ आसानी से तैयार कर लेते हैं, जिससे उन्हें रोजाना 8 से 10 हजार रुपये का औसत रेवेन्यू प्राप्त होता है। बड़ी मात्रा में उत्पादन होने से दुकानदारों की मांग को समय पर पूरा करना उनके लिए संभव हो पाया है।
हर मौसम में रहती है मांग, छोटे-बड़े कुल्हड़ से मुनाफा
कुल्हड़ की मांग के बारे में भूरा बताते हैं कि यह सदाबहार व्यापार है, लेकिन मौसम के अनुसार उत्पाद की मांग बदलती रहती है। गर्मियों के मौसम में जहां बड़े कुल्हड़ (लस्सी के लिए) की भारी मांग रहती है, वहीं सर्दियों में छोटे कुल्हड़ (चाय के लिए) की खपत बढ़ जाती है। बाजार में छोटे चाय वाले कुल्हड़ की कीमत एक रुपये से अधिक है, जबकि बड़े लस्सी वाले कुल्हड़ दो रुपये से अधिक में बिकते हैं। मांग के अनुसार उत्पादन की इस रणनीति ने उनकी आय को काफी सुदृढ़ किया है।
खुद बने आत्मनिर्भर, 18 परिवारों का बने सहारा
इस व्यवसाय की सबसे बड़ी सफलता केवल भूरा हुसैन की व्यक्तिगत आय तक सीमित नहीं है। उन्होंने अपनी फैक्ट्री में कारीगरों और पैकिंग का काम करने वाले करीब 17-18 लोगों को रोजगार दिया है। जो व्यक्ति कभी खुद एक सामान्य आय के लिए संघर्ष कर रहा था, वह आज लगभग 18 परिवारों की आजीविका का सशक्त माध्यम बन गया है।
नजीबाबाद की ट्रेनिंग ने सिखाया व्यापार का हुनर
योजना से जुड़ने के बाद भूरा को नजीबाबाद में 8 से 10 दिन का विशेष प्रशिक्षण भी दिलाया गया था। इस ट्रेनिंग में उन्हें सिखाया गया कि माटीकला के उत्पादों से कैसे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है और नए-नए आइटम बनाकर बाजार में कैसे उतारे जा सकते हैं। भूरा मानते हैं कि इसी ट्रेनिंग के कारण वे अपने कुल्हड़ के व्यवसाय को एक लाभकारी ब्रांड में बदल पाए।
क्या है मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना
यह योजना पारंपरिक कुम्हार समुदाय (प्रजापति) और माटी शिल्पकारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और विलुप्त हो रही कला को संरक्षित करने के लिए शुरू की गई है। इसके तहत माटीकला से जुड़े व्यवसाय जैसे खिलौने, सजावटी सामान, बर्तन या टाइल्स बनाने के लिए 10 लाख रुपये तक का बैंक लोन दिया जाता है। सरकार इस पर 25 प्रतिशत की सब्सिडी (मार्जिन मनी) देती है, जबकि आवेदक को कुल लागत का मात्र 5 प्रतिशत लगाना होता है। 18 से 55 वर्ष का कोई भी उत्तर प्रदेश का मूल निवासी इसके लिए आवेदन कर सकता है। इसके लिए आधार कार्ड, निवास प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, बैंक पासबुक और प्रोजेक्ट रिपोर्ट जैसे दस्तावेजों की आवश्यकता होती है।
