सहकारिता आंदोलन पर हिट हो रही फ़िल्म सरस्वती कुंज गुरुग्राम सहकारी आवासीय समिति, सीएम नायब सिंह सैनी इस फ़िल्म को ज़रूर देखें।।
गुस्ताखी माफ, हरियाणा— पवन कुमार बंसल
सहकार भारती, गुरुग्राम के सौजन्य से
सरस्वती कुंज सहकारी भवन निर्माण समिति लिमिटेड, वजीराबाद (गुरुग्राम) के पीड़ित सदस्यों की आपबीती
इस समिति के सदस्यों में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, आईएएस तथा आईपीएस अधिकारी तक शामिल रहे हैं। आज गुरुग्राम के उपायुक्त इसके अध्यक्ष हैं। फिर भी हजारों सदस्यों का दशकों पुराना इंतजार खत्म होने का नाम नहीं ले रहा।
‘सरस्वती कुंज’ के दरवेश: एक अंतहीन प्लॉट की दास्तान
कहते हैं कि जहां ज्ञान की देवी मां सरस्वती का वास हो, वहां सुख, समृद्धि और शांति का निवास होता है। लेकिन गुरुग्राम के वजीराबाद स्थित ‘सरस्वती कुंज’ की कहानी कुछ और ही बयां करती है। यहां सपनों की नींव तो रखी गई, मगर उन सपनों पर घर कभी नहीं बन पाए।
यह कथा किसी बॉलीवुड सस्पेंस-थ्रिलर से कम नहीं, जिसका क्लाइमेक्स पिछले तीन दशकों से “कमिंग सून” पर अटका हुआ है।
आखिर दर्द क्या है?
एक प्लॉट, दावेदार अनेक — गणित का नया सिद्धांत
सामान्य गणित कहता है कि एक प्लॉट पर एक ही मालिक का अधिकार होता है। लेकिन सरस्वती कुंज के प्रबंधन ने इस सिद्धांत को नई परिभाषा दे दी। एक ही प्लॉट पर तीन-चार लोगों को मालिकाना हक की उम्मीद बंधा दी गई।
नतीजा यह है कि सदस्य वर्षों से अदालतों, दफ्तरों और जांच समितियों के चक्कर काटते हुए यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर उनके हिस्से में प्लॉट का कौन-सा कोना आएगा—बेडरूम, वॉशरूम या सिर्फ खुली हवा!
उम्र गुजर गई, पर पजेशन नहीं आया
जब लोगों ने अपनी युवावस्था में यहां प्लॉट बुक किए थे, तब आंखों में सपने थे, बाल काले थे और भविष्य सुनहरा दिखता था।
आज वही लोग सेवानिवृत्त हो चुके हैं। बाल सफेद हो गए, घुटने जवाब देने लगे और उनके बच्चे स्वयं मकान खरीदने की उम्र में पहुंच गए। लेकिन समिति की फाइलें आज भी वहीं खड़ी हैं, जहां शायद 1990 के दशक में थीं।
कागजों का महाकुंभ
समिति के सदस्यों के पास रसीदों, आवंटन पत्रों, अदालती आदेशों, नोटिसों और जांच रिपोर्टों का ऐसा संग्रह है कि उससे एक छोटी-मोटी लाइब्रेरी स्थापित की जा सकती है।
हर कुछ वर्षों में एक नई जांच समिति गठित होती है, नए आश्वासन दिए जाते हैं, नई समय-सीमाएं तय होती हैं और सदस्य फिर एक नई उम्मीद पाल लेते हैं।
अखबारों में जब भी खबर छपती है कि “सरस्वती कुंज मामले की समीक्षा के लिए नई कमेटी गठित”, तो सदस्यों की धड़कनें कुछ ऐसे बढ़ जाती हैं जैसे बजट के दिन मध्यमवर्गीय परिवार की।
सदस्यों की जुबानी
एक बुजुर्ग सदस्य चश्मा ठीक करते हुए कहते हैं—
“बेटा, जब मैंने प्लॉट लिया था तो सोचा था कि रिटायरमेंट के बाद अपने घर के बरामदे में बैठकर चाय पीते हुए अखबार पढ़ूंगा। अब रिटायर हुए दस साल हो गए। रोज अखबार में सरस्वती कुंज की अगली सुनवाई की तारीख पढ़ता हूं, लेकिन चाय आज भी किराए के मकान में ही पीनी पड़ती है।”
एक अन्य सदस्य, जो कभी युवा थे और अब स्वयं वरिष्ठ नागरिक बनने की दहलीज पर हैं, मुस्कुराते हुए कहते हैं—
“अंकल, आप तो भाग्यशाली हैं कि कम से कम आपके पास प्लॉट की रसीद तो है। मेरे प्लॉट नंबर की स्थिति ऐसी है कि जीपीएस भी तय नहीं कर पाता कि वह वजीराबाद में है या फाइलों के किसी खोए हुए द्वीप पर!”
सब्र का फल… सिर्फ तारीखें
सरस्वती कुंज के सदस्यों ने शायद “सब्र का फल मीठा होता है” वाली कहावत को सबसे अधिक चुनौती दी है।
यहां सब्र का फल वर्षों से केवल “तारीख पर तारीख”, “जांच पर जांच” और “आश्वासन पर आश्वासन” के रूप में मिलता आया है।
गुरुग्राम की ऊंची-ऊंची इमारतों और चमकती सड़कों के बीच इस समिति के हजारों सदस्य आज भी अपनी पीली पड़ चुकी रसीदें संभाले सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं। विडंबना यह है कि वे अपनी ही जमीन पर वर्षों से अतिथि बने हुए हैं।
अंतिम प्रार्थना
हे विधाता!
गुरुग्राम के इस ‘सरस्वती कुंज’ को अब कोई ऐसा सच्चा तारणहार मिले, जो फाइलों के इस अंतहीन जाल को काट सके और इन बुजुर्ग होते सदस्यों को उनके जीवनभर के सपनों की चौखट तक पहुंचा सके।
क्योंकि हर इंतजार की भी एक उम्र होती है।
