गुस्ताख़ी माफ — हरियाणा: पवन कुमार बंसल
किसी के पास वोट बैंक है, किसी के पास स्विस बैंक;
हमारे पास तो बस “न्यूज़ बैंक” है।
रोज़ इतनी ख़बरें आती हैं कि मैं उन्हें पत्रकारों में बाँटने को तैयार हूँ—
बस शर्त इतनी है कि वे उन्हें छापने को भी तैयार हों।
इन दिनों मेरे साथ भी कुछ वैसा ही हो रहा है, जैसा उन बाबा जी के साथ हुआ था—
बाल और बाँझ औरत की कहानी।
बाबा जी ने जिस गाँव के बाहर अपनी कुटिया बनाई थी,
वहाँ एक औरत कई सालों से निःसंतान थी।
बाबा जी ने उसे अपने सिर का एक बाल दिया।
किस्मत का खेल देखिए—उसे जुड़वाँ बच्चे हो गए।
फिर क्या था, यह बात आग की तरह फैल गई।
औरतें दूर-दूर से आने लगीं,
और बाबा जी के बाल अपना कमाल दिखाने लगे।
चर्चा बढ़ी, भीड़ उमड़ी—
और एक दिन ऐसा आया कि
काफ़ी औरतें एक साथ आईं…
और बाबा जी के सारे बाल ही उखाड़कर ले गईं।
