मोहरा पावर प्रोजेक्ट फिर होगा शुरू, जम्मू-कश्मीर सरकार का बड़ा कदम; पाकिस्तान को लग सकता है झटका

जम्मू-कश्मीर सरकार ने ऐतिहासिक मोहरा पावर प्रोजेक्ट को दोबारा शुरू करने की दिशा में अहम कदम बढ़ाया है। झेलम नदी पर स्थित यह करीब 120 साल पुराना जलविद्युत प्रोजेक्ट लंबे समय से बंद पड़ा था, जिसे अब पुनर्जीवित करने की योजना बनाई जा रही है। इस फैसले को रणनीतिक और ऊर्जा क्षेत्र दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में इस परियोजना को लेकर जानकारी देते हुए बताया कि जम्मू-कश्मीर राज्य विद्युत विकास निगम (J&K SPDC) ने इसे फिर से चालू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री के पास बिजली विभाग का प्रभार भी है।

बारामुला जिले के उरी सेक्टर के बोनियार इलाके में स्थित यह प्रोजेक्ट भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे पुराने जलविद्युत संयंत्रों में गिना जाता है। शुरुआती दौर में इसकी उत्पादन क्षमता करीब 5 मेगावाट थी, जो 1992 में आई भीषण बाढ़ के बाद घटकर लगभग 3 मेगावाट रह गई थी। भारी नुकसान के चलते इसे अंततः बंद करना पड़ा।

सरकार का लक्ष्य इस ऐतिहासिक परियोजना को आधुनिक तकनीक के साथ पुनर्जीवित कर बड़े स्तर पर बिजली उत्पादन करना है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, आने वाले वर्षों में जम्मू-कश्मीर में कुल 11,000 मेगावाट तक बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें इस प्रोजेक्ट की भी भूमिका अहम हो सकती है।

पाकिस्तान पर असर की संभावना

मोहरा पावर प्रोजेक्ट के पुनरुद्धार को पाकिस्तान के लिए एक रणनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल, पाकिस्तान की खेती काफी हद तक सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों के पानी पर निर्भर है। यदि इन नदियों के जल प्रवाह में किसी भी प्रकार की कमी आती है, तो पाकिस्तान की कृषि व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है।

सिंधु जल संधि के स्थगन के बाद भारत ने जल संसाधनों को लेकर अपने रुख में सख्ती दिखाई है। भारत द्वारा नदियों से संबंधित डेटा साझा करना भी बंद कर दिया गया है। ऐसे में मोहरा पावर प्रोजेक्ट का दोबारा शुरू होना पाकिस्तान की चिंता बढ़ा सकता है।

इंजीनियरिंग विरासत का अनूठा उदाहरण

मोहरा पावर प्रोजेक्ट को कश्मीर की इंजीनियरिंग विरासत का अनूठा नमूना माना जाता है। इसकी सबसे खास विशेषता इसका लकड़ी का जल-मार्ग (वुडन फ्लूम) है, जो पहाड़ों के किनारे-किनारे करीब 10 किलोमीटर तक फैला हुआ है। इसी मार्ग से पानी लाकर टर्बाइनों को चलाया जाता था। अपने समय में यह एक अत्याधुनिक और पर्यावरण के अनुकूल तकनीक मानी जाती थी।

कुल मिलाकर, इस ऐतिहासिक प्रोजेक्ट का पुनरुद्धार न केवल ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देगा, बल्कि कश्मीर की विरासत को भी नई पहचान दिलाने का काम करेगा।

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