बाल्टी से ‘स्टील किंग’ तक: ओ.पी. जिंदल की सादगी, संघर्ष और शख्सियत की अनकही कहानी

गुस्ताख़ी माफ़ हरियाणा -पवन कुमार बंसल 

स्टील किंग, स्वर्गीय ओ. पी. जिंदल वाकई में एक महान व्यक्तित्व थे।
बाल्टी बनाते-बनाते उन्होंने “स्टील किंग” बनने तक का अद्भुत सफर तय किया।

हरियाणा विधानसभा के 2005 के चुनाव से पहले ओ. पी. जिंदल मेरे संपर्क में आए थे। उनका भजन लाल से छत्तीस का आंकड़ा था। हालांकि, उन्होंने भजन लाल के दामाद अनुप बिश्नोई का बिज़नेस एम्पायर खड़ा करने में काफी मदद की थी, लेकिन बाद में भजन लाल उनसे नाराज़ हो गए और उनके खिलाफ टाडा के तहत केस तक दर्ज करवा दिया।

उन दिनों भूपिंदर सिंह हुड्डा कांग्रेस की राजनीति में उभर रहे थे। जिंदल साहब और हुड्डा जी की मुलाकात मेरे रोहतक स्थित ऑफिसर्स कॉलोनी के मकान में हुई थी। वहीं दोनों के बीच भजन लाल का खुलकर विरोध करने की बात हुई।

एक बार मैंने जिंदल साहब से कहा कि मैं अपनी बेटी का दाखिला उनके विद्या देवी जिंदल हिसार स्कूल में करवाना चाहता हूँ। वे मुझे हिसार ले गए, स्कूल दिखाया और वहां किसी कर्मचारी की जिम्मेदारी भी लगा दी।

लेकिन मैंने दाखिला नहीं करवाया। एक हफ्ते बाद उन्होंने पूछा—“क्या स्कूल पसंद नहीं आया?”
मैंने कहा—“मेरा बेटा भी बाहर पढ़ रहा है, और दो बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना मेरी हैसियत में नहीं है।”

इस पर जिंदल साहब बोले—
“पवन, मुझे जूते मार लेना, लेकिन तुझे फीस की क्या चिंता थी? वो मेरी बेटी है।”

एक दिन उन्होंने हँसते हुए कहा—
“जो भी पत्रकार मुझसे मिलता है, मेरी कंपनी के शेयर मांगता है, और तू है कि आज तक शेयर नहीं मांगे।”
मैंने जवाब दिया—“ज़रूरत ही नहीं पड़ी।”

शाम के समय जिंदल साहब अक्सर अपने दोस्तों के साथ हिसार के जिंदल गेस्ट हाउस में ताश खेलते थे। वे कहते थे कि हमारी कोशिश रहती है कि शाम को परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर भोजन करें।

वे बेहद सादगी पसंद इंसान थे—अक्सर बिना फीते वाले जूते पहनते थे।

About The Author

Leave A Reply

Your email address will not be published.