घोर राजनीतिक विरोधी माने जाने वाले भूपिंदर सिंह हुड्डा और बीरेंद्र सिंह ने अपने मतभेद भुलाकर एकजुटता दिखाई—और इस एकजुटता का शिकार बने रणदीप सिंह सुरजेवाला
गुस्ताख़ी माफ़ हरियाणा — पवन कुमार बंसल
हरियाणा की राजनीति अपने आप में एक अलग ही रंगमंच है, जहाँ किरदार वही रहते हैं, लेकिन भूमिकाएँ समय के साथ बदलती रहती हैं। यहाँ न कोई स्थायी दोस्त होता है, न कोई स्थायी दुश्मन—सिर्फ़ हालात के मुताबिक बनते-बिगड़ते समीकरण होते हैं।
एक दौर ऐसा भी आया जब घोर राजनीतिक विरोधी माने जाने वाले भूपिंदर सिंह हुड्डा और बीरेंद्र सिंह ने अपने मतभेद भुलाकर एकजुटता दिखाई—और इस एकजुटता का निशाना बने रणदीप सुरजेवाला। दोनों नेताओं ने मिलकर उनका टिकट कटवाने में अहम भूमिका निभाई। यह घटना हरियाणा की उस सियासत की मिसाल है, जहाँ रणनीति, साज़िश और अवसरवादिता अक्सर सिद्धांतों पर भारी पड़ते हैं।
राजनीति के इस अखाड़े में रिश्ते क्षणिक होते हैं और भरोसा अक्सर एक भ्रम। यहाँ दल-बदल, पीठ पीछे वार और सत्ता की होड़ आम बात है। ऐसे सैकड़ों दिलचस्प और चौंकाने वाले किस्से हरियाणा की राजनीति, संस्कृति और प्रशासन की परतें खोलते हैं—जिन्हें मेरी शीघ्र प्रकाशित होने वाली पुस्तक ‘हरियाणा के लालों के सबरंगे किस्से’ के नवीन संस्करण में विस्तार से पढ़ा जा सकेगा।
साल 2004 के लोकसभा चुनाव का प्रसंग भी कुछ ऐसा ही है। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हिसार लोकसभा सीट से रणदीप सुरजेवाला के नाम की घोषणा कर दी थी। लेकिन यह फैसला कुछ नेताओं को रास नहीं आया। भूपिंदर सिंह हुड्डा और बीरेंद्र सिंह—जो आपस में रिश्तेदार भी हैं—इस घोषणा से असहज हो उठे।
बताया जाता है कि दोनों नेताओं ने मिलकर ऐसा दबाव बनाया कि सुरजेवाला की उम्मीदवारी पर विराम लग गया। तर्क यह दिया गया कि यदि उन्हें टिकट दिया गया, तो जयप्रकाश यानी जेपी भाजपा का रुख कर सकते हैं। अंततः समीकरण बदले और फैसला भी।
हालाँकि, यह राजनीतिक दोस्ती ज्यादा समय तक कायम नहीं रह सकी। जल्द ही हालात बदले और वही सहयोगी एक-दूसरे के रास्ते में खड़े नजर आए। एक समय ऐसा भी आया जब भूपिंदर सिंह हुड्डा ने बीरेंद्र सिंह के मनमोहन सरकार में मंत्री बनने की राह में बाधा खड़ी कर दी।
यही है हरियाणा की राजनीति—जहाँ हर मोड़ पर नया समीकरण, हर कदम पर नई कहानी।
