गुस्ताखी माफ हरियाणा – पवन कुमार बंसल
चंडीगढ़ से एक पाठक ने लिखा—“सर, मुझे आपकी सुरक्षा की चिंता रहती है।”
भाई, सुरक्षा तो राम भरोसे है। मेरे लिए पाठकों का प्यार ही सबसे बड़ी सुरक्षा और सबसे बड़ी ताकत है।
यह किस्सा 1990 का है। उस समय मेरी खबरों से कई नेता काफी नाराज़ थे। मैं जनसत्ता में लगातार ऐसी खबरें लिख रहा था, जो सत्ताधारियों को असहज करती थीं। उस दौर में मैं स्वयं भी कुछ अवसाद और तनाव से गुजर रहा था। परिवार पर भी इसका असर था। पत्नी को मेरी सुरक्षा को लेकर स्वाभाविक चिंता रहती थी।
इसी बीच सफीदों से एक पाठक अचानक पंचकूला स्थित मेरे निवास पर आए। मैं उन्हें जानता तक नहीं था। उनका नाम श्याम कटारिया था—भगवान उन्हें लंबी उम्र दे। वे रूसी लेखक Boris Polevoy की प्रसिद्ध पुस्तक असली इंसान की कहानी की एक प्रति मेरे लिए लेकर आए थे।
उस पुस्तक पर उन्होंने अपने हाथ से लिखा—
“पत्रकारिता के असली इंसान श्री पवन बंसल को भेंट।
15 अगस्त 1990।”
उस दिन वे मेरे लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं थे। मैंने पत्नी से कहा—“देखो, यह इंसान सफीदों से बस में बैठकर सिर्फ मुझसे मिलने आया है। जब पाठकों का इतना प्यार साथ है, तो फिर मुझे किसी से डरने की जरूरत नहीं।”
आज भी वह किताब मेरी लाइब्रेरी में सुरक्षित है और हर बार उसे देखता हूं तो मन में नई ऊर्जा और विश्वास का संचार होता है। सच तो यह है कि पत्रकार की असली ताकत न सत्ता होती है, न संसाधन—उसकी असली ताकत उसके पाठक होते हैं।
