“अपने बेटे को न लगाऊं तो क्या तेरे बेटे को चेयरमैन बना दूं?” — जब देवीलाल ने दिया ठेठ जवाब

गुस्ताखी माफ हरियाणा – पवन कुमार बंसल

लुधियाना से आम आदमी पार्टी के विधायक मदन लाल बग्गा के बेटे को नगर निगम का लीगल एडवाइजर बनाए जाने पर इन दिनों हंगामा मचा हुआ है। आरोप है कि रिश्तेदारी और राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल किया गया।

लेकिन हरियाणा की राजनीति में यह कोई नई बात नहीं है। किस्सा 1987 का है, जब Devi Lal हरियाणा के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने अपने बेटे Pratap Singh को हरियाणा एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन का चेयरमैन नियुक्त कर दिया।

एक वरिष्ठ पत्रकार ने उनसे इस फैसले पर सवाल पूछ लिया। देवीलाल अपने ठेठ हरियाणवी अंदाज में बोले—
“अपने बेटे को न लगाऊं तो क्या तेरे बेटे को चेयरमैन बना दूं?”

इतना कहते ही माहौल शांत हो गया। बाद में उन्होंने संभलते हुए यह भी जोड़ा कि वह पत्रकार रोज बयानबाजी करता था, उसका मुंह बंद करना जरूरी था, सो कर दिया।

वैसे देवीलाल के पत्रकारों से सामान्यतः मधुर संबंध रहते थे। लेकिन 1987 से 1990 तक, जब मैं जनसत्ता का रिपोर्टर था और ‘गुस्ताखी माफ हरियाणा’ लिखता था, तो हमारे रिश्ते काफी तल्ख रहे। एक बार किसी खबर से नाराज़ होकर उन्होंने Ramnath Goenka से शिकायत कर दी। मैं उन दिनों प्रोबेशन पर था।

यह हमारे प्रधान संपादक Prabhash Joshi का बड़प्पन था कि उन्होंने तमाम दबावों के बावजूद मेरा बचाव किया। आज ऐसे संपादक कहां मिलते हैं?

हरियाणा की राजनीति में पत्रकारों और नेताओं के रिश्ते हमेशा दिलचस्प रहे हैं। Bansi Lal, Om Prakash Chautala, Bhupinder Singh Hooda, Bhajan Lal और Manohar Lal Khattar—सबके पत्रकारों से रिश्तों की अपनी-अपनी कहानियां हैं, जिनका खुलासा फिर कभी।

दरअसल, ज्यादातर नेताओं के पत्रकारों से संबंध वक्त के साथ बदलते रहते हैं। जब वे विपक्ष में होते हैं, तो पत्रकार उन्हें प्रेमिका की तरह लगते हैं—उनके नाज-नखरे उठाते हैं, त्योहारों पर उपहार भी देते हैं। लेकिन जैसे ही सत्ता हाथ में आती है, वही रिश्ता प्रेमिका से बदलकर “पुरानी पत्नी” जैसा हो जाता है—जिसे तलाक तो नहीं दिया जा सकता, मगर बर्दाश्त जरूर करना पड़ता है।

राजनीति और पत्रकारिता का यह रिश्ता कभी पूरी तरह मधुर नहीं रहा, लेकिन लोकतंत्र में दोनों की जरूरत बराबर है।

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