“चौधरन, खबर का महकमा तो उसका है। अगर मेरे घरवाले ने तुझे छेड़ा है तो दफ्तर चल। चार जूते तू मारियो और आठ मैं!” चौधरन और मेरी मैडम दोनों नरवाना की थीं
गुस्ताखी माफ हरियाणा — पवन कुमार बंसल
अपने घरवाले ने संभाल ले!
मेरी किताब “हरियाणा के लालों के सबरंग किस्से” से साभार
राजनीति और करप्शन पर चर्चा पढ़कर आप भी बोर हो गए होंगे। अब थोड़ा मनोरंजन।
1987 में लेखक चंडीगढ़ जनसत्ता का रिपोर्टर था। पंचकूला में रहता था। एक दिन चंडीगढ़ अपने दफ्तर में अपना साप्ताहिक कॉलम लिख रहा था। उन दिनों मोबाइल नहीं होते थे। पीबीएक्स से ऑपरेटर ने फोन मिलाया। मैंने सोचा, मैडम का फोन होगा। मुझे कॉलम लिखने की जल्दी थी।
उधर से किसी महिला की आवाज आई। मैंने मैडम का फोन समझकर कहा— “बादशाहो, क्यों फोन किया?”
उधर से आवाज आई— “आपने मेरे घरवाले के खिलाफ खबर लिख दी है।”
अब मैं अचंभे में पड़ गया। पूछने पर महिला ने बताया— “मैं चेयरमैन साहिब की घरवाली हूँ।” फिर बोली— “पत्रकार भगवान नहीं होते।”
मैंने कहा— “मैंने कभी ऐसा दावा नहीं किया।”
फिर बोली— “आप शाम को मुझसे मिलो।”
मैंने कहा— “मैं ऐसे किसी से, और वो भी अनजान महिला से, नहीं मिलता। हां, आपके पति मुझे अच्छी तरह जानते हैं। उन्हें जरूरत होगी तो वो मिल लेंगे, और मुझे होगी तो मैं मिल लूंगा।”
अब मैंने अपनी मैडम से पूछा कि इसे दफ्तर का नंबर किसने दिया?
मैडम बोली— “मेरे पास फोन आया कि अपने घरवाले ने संभाल ले। मैं घबरा गई कि कहीं कोई चोट तो नहीं लग गई।”
उधर चौधरन बोली— “तेरे घरवाले ने मेरे घरवाले के खिलाफ खबर लिख दी।”
मेरी मैडम भी बोली— “देख चौधरन, खबर का महकमा तो उसका है। हां, अगर मेरे घरवाले ने तुझे छेड़ा है तो दफ्तर चल। चार जूते तू मारियो और आठ मैं!”
चौधरन और मेरी मैडम दोनों नरवाना की थीं।
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