नई दिल्ली। फाल्गुन अमावस्या पर सूर्यग्रहण का संयोग धर्म और ज्योतिष की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत में प्राचीन धर्मग्रंथों और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार यह समय आत्मसंयम, साधना और मानसिक शुद्धि के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। इस दौरान विशेष सावधानी और संयम बरतने की सलाह दी जाती है।
क्यों विशेष मानी जाती है फाल्गुन अमावस्या
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार फाल्गुन अमावस्या का संबंध पितरों की शांति और आत्मशुद्धि से जुड़ा हुआ है। अमावस्या के दिन तर्पण, दान और ध्यान को विशेष महत्व दिया गया है। जब इसी दिन सूर्यग्रहण का योग बनता है, तो इसे और अधिक संवेदनशील और आध्यात्मिक दृष्टि से प्रभावशाली काल माना जाता है।
सूर्यग्रहण के दौरान ऊर्जा संतुलन में बदलाव की मान्यता
धर्मशास्त्रों के अनुसार सूर्य को आत्मा, ऊर्जा और तेज का प्रतीक माना गया है। ग्रहण के दौरान सूर्य का प्रकाश आंशिक या पूर्ण रूप से प्रभावित होता है, जिसे धार्मिक दृष्टि से आत्मसंयम और साधना का समय बताया गया है। इस अवधि में सांसारिक भोग-विलास से दूरी रखने की सलाह दी जाती है।
इन कार्यों से बचने की दी जाती है सलाह
धार्मिक ग्रंथों और आचार्यों के अनुसार ग्रहणकाल और अमावस्या के समय कुछ कार्यों से बचना चाहिए, जैसे—
भोग-विलास और सांसारिक सुख में लिप्त होना
क्रोध और विवाद करना
नकारात्मक विचारों में उलझना
असंयमित जीवनशैली अपनाना
मान्यता है कि इस समय संयम और सकारात्मक आचरण से मानसिक शांति और पारिवारिक सौहार्द बना रहता है।
क्या करना माना जाता है शुभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन निम्न कार्य करना लाभकारी माना जाता है—
मंत्र जाप और ध्यान
पितरों के लिए तर्पण और दान
सात्विक भोजन ग्रहण करना
मौन और संयम का पालन
सकारात्मक विचारों और आत्मचिंतन में समय देना
संयम और साधना का संदेश
धार्मिक दृष्टिकोण से फाल्गुन अमावस्या और सूर्यग्रहण का संयोग आत्मनिरीक्षण, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर माना जाता है। आचार्यों का कहना है कि इस दिन संयम और शांति का पालन करने से मानसिक संतुलन और पारिवारिक सुख-शांति में वृद्धि हो सकती है।
khabre junction
