आपातकाल के विरुद्ध अडिग संघर्ष की मिसाल बने सुरेंद्र खन्ना

गुस्ताखी माफ हरियाणा – पवन कुमार बंसल

नमन सुरिंदर खन्ना जी के जीवन से।
प्रेरणा लें आज के आरएसएस के नेता।
छविंदर ठाकुर की एफबी वॉल से साभार।

सुरिंदर खन्ना जी आपातस्थिति में मीसा के अंतर्गत बंद रहे।
कुल्लू घाटी के निचले क्षेत्र शमशी के निवासी स्वर्गीय श्री सुरेंद्र खन्ना, एडवोकेट, भी देश में आपातस्थिति के विरुद्ध किए गए संघर्ष में अग्रणी रहे।

वर्ष 1975 में मात्र 38 वर्ष की आयु में खन्ना जी को मीसा के अंतर्गत जेल यात्रा करनी पड़ी। उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सक्रिय खन्ना जी मीसा के तहत 19 महीने धर्मशाला की योल कैंट जेल में बंदी बनाए गए। उन्हें रात 10 बजे उनके शमशी स्थित घर से ले जाया गया और सुबह साढ़े पाँच बजे धर्मशाला पहुँचा दिया गया।

तरह-तरह के मानसिक व शारीरिक उत्पीड़न और दबाव के बावजूद सुरेंद्र खन्ना जी नहीं झुके। वे आपातस्थिति के विरोध में पूरी तरह डटे रहे और टस से मस नहीं हुए।

इमरजेंसी के उस दौर में जब अनेक लोगों ने माफ़ियाँ माँगीं और भयवश संघ व जनसंघ से अपने संबंधों को सार्वजनिक रूप से नकार दिया, तब भी एडवोकेट खन्ना जी—जिनके रक्त में देशभक्ति रची-बसी थी—ने उफ़ तक नहीं की। लोगों को पकड़-पकड़ कर किसी न किसी बहाने जेलों में ठूँसा जा रहा था, फिर भी खन्ना जी भयभीत नहीं हुए।

उन्हें जेल में उस बैरक में रखा गया जहाँ कभी लाला लाजपत राय को रखा गया था। जेलर उन पर दबाव डालता कि इतना लिखकर दे दो कि “मैं संघ के लिए काम नहीं करता”, परंतु खन्ना जी हर बार जेलर की बात को अनसुना कर देते।

मूल रूप से जम्मू-कश्मीर के पुंछ–राजौरी के निवासी खन्ना जी अनेक परेशानियों और भय के माहौल के बावजूद घर में बुज़ुर्ग माता-पिता को छोड़कर जी-जान से संघर्ष में जुटे रहे। अपनी धुन के पक्के खन्ना जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निष्ठावान कार्यकर्ता थे और उन्होंने संघ के लिए अत्यंत समर्पण भाव से कार्य किया। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिमाचल संभाग संघ चालक रहे।

जेल से रिहा होने पर कुल्लू में उनका ऐतिहासिक स्वागत किया गया। खन्ना जी चाहते तो बड़े से बड़ा मनचाहा पद प्राप्त कर सकते थे, परंतु उनके लिए पद और ओहदे गौण थे—राष्ट्रभक्ति सर्वोपरि थी।

श्री खन्ना जी न केवल कुल्लू घाटी बल्कि समस्त भारतवर्ष के संघ स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। वे वर्ष 2023 में स्वर्ग सिधार गए, परंतु आज भी उनका नाम एक सच्चे, निडर देशभक्त के रूप में गर्व के साथ लिया जाता है।

उनके सुपुत्र निखिल खन्ना और नितिन खन्ना अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए सच्चाई और ईमानदारी के मार्ग पर अग्रसर हैं। दुर्भाग्य से उनकी पत्नी श्रीमती सुषमा खन्ना भी अब हमारे बीच नहीं हैं। खन्ना जी के देहावसान के कुछ ही दिनों बाद बीमारी के कारण उनका भी निधन हो गया।

हिमाचल प्रदेश को सुरेंद्र खन्ना जी जैसे निडर, जुझारू और दबंग संघ मार्गदर्शक पर गर्व है।
दुमछला—सुरिंदर खन्ना जी से इस लेखक की कई बार मुलाक़ात हुई है। सुषमा खन्ना मेरी धर्मबहन थीं। उनके भाई स्वतंत्र सेठी मेरे राजकीय महाविद्यालय, जींद के समय के मित्र रहे हैं। सुषमा खन्ना कॉलेज में श्रेष्ठ वक्ता थीं।

 

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