गुस्ताखी माफ़ हरियाणा – पवन कुमार बंसल
समय बड़ा बलवान: कल इंदिरा गांधी का सिक्का, आज नरेंद्र मोदी कहते हैं समय सबसे बड़ा बलवान होता है। राजनीति में चेहरे बदलते हैं, सत्ता के केंद्र बदलते हैं, लेकिन समय का पहिया लगातार घूमता रहता है। एक दौर था जब देश की राजनीति में इंदिरा गांधी का सिक्का चलता था, आज वही जगह नरेंद्र मोदी ने ले ली है। इतिहास गवाह है कि जनभावना जब किसी एक नेतृत्व के साथ खड़ी हो जाती है, तो बड़े-बड़े किले ढह जाते हैं।
आदमपुर के पास बगला गांव में रामलीला करने वाले पंडित दुनिचंद जी ने मार्च 1971 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी की ऐतिहासिक जीत पर एक रचना की थी। यह केवल कविता नहीं, बल्कि उस समय की राजनीतिक सच्चाई और इतिहास का जीवंत दस्तावेज़ है। इसके महत्व को वही समझ सकता है जो उस दौर की राजनीति और जनमानस को जानता हो।
इंदिरा गांधी की उस विजय को बाद में अटल बिहारी वाजपेयी ने भी स्वीकार किया। बांग्लादेश निर्माण के बाद उन्होंने इंदिरा जी को ‘दुर्गा का अवतार’ कहा था। 1971 का चुनाव वास्तव में शक्तिशाली वर्ग, बड़े उद्योगपतियों और राजे-रजवाड़ों के खिलाफ जनसाधारण की जीत था। कविता की पंक्तियों में निजलिंगप्पा की हार, शाही पार्टियों की पराजय और धनबल की पराजित नाव का उल्लेख उसी जनआक्रोश और बदलाव की कहानी कहता है।
उस दौर में स्वतंत्र पार्टी, जनसंघ, क्रांतिदल और कई दिग्गज नेताओं की सियासत धराशायी हो गई। बड़े-बड़े उद्योगपति, सेठ-साहूकार और स्थापित राजनीतिक चेहरे जनता की लहर के सामने टिक नहीं पाए। 351 सीटों के साथ इंदिरा गांधी की जीत न सिर्फ चुनावी विजय थी, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक शक्ति संतुलन में बड़ा परिवर्तन थी।
पंडित दुनिचंद की रचना में गऊ माता, गरीबों का पक्ष, राजाओं और धनवानों के विरुद्ध संघर्ष और जनता की निर्णायक भूमिका को रूपक के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। यही कारण है कि यह रचना आज भी प्रासंगिक लगती है।
आज जब देश नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक अलग दौर देख रहा है, तो 1971 की यह कहानी याद दिलाती है कि सत्ता स्थायी नहीं होती, बल्कि जनविश्वास ही असली ताकत है। समय बदलता है, चेहरे बदलते हैं, पर लोकतंत्र में अंतिम फैसला हमेशा जनता का ही होता है। यही समय की सबसे बड़ी शक्ति है।
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