बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के चुनाव परिणामों ने महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा उलटफेर कर दिया है। एशिया की सबसे अमीर नगरपालिका मानी जाने वाली बीएमसी, जो पिछले लगभग 30 वर्षों से ठाकरे परिवार के नियंत्रण में थी, अब बीजेपी–एकनाथ शिंदे शिवसेना के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन के कब्जे में चली गई है। चुनाव परिणामों में 227 वार्डों में महायुति को 118 से अधिक सीटें मिलीं, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) का गठबंधन 70–72 सीटों तक सिमट गया।
चुनाव नतीजों के अनुसार उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को लगभग 64–65 सीटें मिलीं, जबकि राज ठाकरे की एमएनएस महज 6–9 सीटों पर ही सिमट गई। मुंबई की जनता ने इस तरह उद्धव–राज गठबंधन को स्पष्ट रूप से नकार दिया।
यह चुनाव ठाकरे बंधुओं के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई माना जा रहा था। करीब 20 साल बाद उद्धव और राज ठाकरे ने एक साथ आकर ‘मराठी मानूस’ एजेंडे को फिर से जीवित करने की कोशिश की, लेकिन मुंबई की बदलती जनसांख्यिकी, विकास की आकांक्षा और नए राजनीतिक समीकरणों ने इस रणनीति को कमजोर कर दिया। वर्ष 2017 में अविभाजित शिवसेना ने 84 सीटें जीती थीं, जबकि इस बार उद्धव ठाकरे का प्रदर्शन उससे भी कम रहा।
हार के प्रमुख कारण
1. राज ठाकरे के साथ गठबंधन की रणनीतिक चूक
उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस–एनसीपी (एसपी) के बजाय राज ठाकरे के साथ गठबंधन किया, जबकि एमएनएस पहले से ही कमजोर स्थिति में थी। राज ठाकरे की आक्रामक ‘मराठी अस्मिता’ और पुरानी विभाजनकारी बयानबाजी ने उत्तर भारतीय, गुजराती, मुस्लिम और दक्षिण भारतीय मतदाताओं को इस गठबंधन से दूर कर दिया। मुंबई में मराठी मतदाता 40 प्रतिशत से भी कम हैं, ऐसे में गैर-मराठी बहुल इलाकों में यह गठबंधन नुकसानदेह साबित हुआ।
2. ‘मराठी मानूस’ एजेंडे की घटती प्रासंगिकता
ठाकरे खेमे ने हिंदी थोपे जाने और बाहरी लोगों के खिलाफ मुद्दा उठाया, लेकिन मुंबई की जनता अब विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार को प्राथमिकता दे रही है। बीजेपी ने देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में ‘विकास मॉडल’ को आगे बढ़ाया, जो मतदाताओं को अधिक आकर्षक लगा।
3. बीजेपी की मजबूत संगठनात्मक रणनीति
देवेंद्र फडणवीस ने मुंबई में ठाकरे ब्रांड को सीधी चुनौती दी। महायुति ने हिंदुत्व और विकास को एक साथ जोड़ते हुए मजबूत चुनावी रणनीति अपनाई। शिंदे गुट को जहां 27–30 सीटें मिलीं, वहीं बीजेपी अकेले सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।
4. पुराने सहयोगियों का साथ छूटना
उद्धव ठाकरे की लंबे समय तक चली सत्ता बीजेपी और आरपीआई (ए) जैसे सहयोगियों पर आधारित थी। इनके अलग हो जाने से शिवसेना (यूबीटी) कमजोर हुई। वहीं राज ठाकरे के साथ आने से मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक मतदाता भी नाराज नजर आए।
5. विपक्षी एकता और छवि सुधार में असफलता
उद्धव ठाकरे ने खुद को मध्यमार्गी नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की, लेकिन राज ठाकरे की छवि ने इस प्रयास को नुकसान पहुंचाया। एमएनएस का वोट ट्रांसफर भी अपेक्षित स्तर तक नहीं हो सका।
बीएमसी चुनाव में यह हार ठाकरे ब्रांड के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है। हालांकि उद्धव ठाकरे ने शिंदे गुट से अधिक सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक साख को कुछ हद तक बचाए रखा है। कुल मिलाकर, मुंबई की राजनीति अब एक नई दिशा में बढ़ती दिख रही है, जहां विकास और प्रशासनिक दक्षता को प्राथमिकता मिल रही है और पुरानी अस्मिता की राजनीति धीरे-धीरे हाशिए पर जाती नजर आ रही है।
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