क्या मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में एआई निभाएगा महत्वपूर्ण भूमिका? – डॉ. अतुल मलिमकराम (राजनीतिक रणनीतिकार)

भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती उसकी विविधता और गहराई में निहित है, और समय-समय पर होने वाले चुनाव इस खूबसूरती को और अधिक निखारते हैं। मध्य प्रदेश जैसे विशाल और सामाजिक-आर्थिक रूप से विविध राज्य में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं होते, बल्कि वे जनता की आकांक्षाओं, अपेक्षाओं और भविष्य की दिशा का स्पष्ट संकेत भी देते हैं। वर्ष 2028 में होने वाला मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव इस दृष्टि से खास माना जा रहा है, क्योंकि यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और उन्नत डिजिटल तकनीकों के परिपक्व दौर में संपन्न होगा।

राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिमकराम के अनुसार, मध्य प्रदेश का चुनावी परिदृश्य भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विविधताओं से भरा हुआ है। आदिवासी बहुल अंचल, ग्रामीण कृषि क्षेत्र, उभरते शहरी केंद्र और औद्योगिक इलाके—सभी की समस्याएँ और प्राथमिकताएँ अलग-अलग हैं। ऐसे में एक-सी चुनावी रणनीति अब प्रभावी नहीं रह गई है। एआई आधारित तकनीकें इस चुनौती को अवसर में बदलने की क्षमता रखती हैं।

डॉ. मलिमकराम का मानना है कि डेटा एनालिटिक्स, सोशल मीडिया इनसाइट्स और डिजिटल व्यवहार के विश्लेषण के माध्यम से मतदाताओं से अधिक सटीक, प्रासंगिक और प्रभावी संवाद संभव हो सकेगा। 2028 के चुनाव में एआई आधारित हाइपर-पर्सनलाइज्ड कैंपेनिंग निर्णायक भूमिका निभा सकती है। किसानों के लिए कृषि, सिंचाई और समर्थन मूल्य, युवाओं के लिए रोजगार और शिक्षा, महिलाओं के लिए सुरक्षा व स्वास्थ्य, तथा आदिवासी समुदायों के लिए वनाधिकार और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर लक्षित संवाद पहले से कहीं अधिक असरदार हो सकता है।

उन्होंने कहा कि डिजिटल और वर्चुअल माध्यमों का विस्तार भी इस चुनाव की एक प्रमुख विशेषता होगा। वर्चुअल रैलियाँ, डिजिटल टाउन-हॉल और सीमित स्तर पर मेटावर्स जैसे प्लेटफॉर्म राजनीतिक संवाद के नए स्वरूप प्रस्तुत कर सकते हैं। इससे प्रचार लागत और सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ कम होंगी, साथ ही दूरदराज़ के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों तक सीधा संवाद संभव हो पाएगा।

हालाँकि, डॉ. मलिमकराम ने एआई के साथ जुड़ी चुनौतियों को भी रेखांकित किया। डीपफेक, फर्जी वीडियो-ऑडियो, गलत सूचना और भ्रामक कंटेंट का खतरा बढ़ सकता है, जो मतदाताओं के विश्वास और सामाजिक सौहार्द्र को नुकसान पहुँचा सकता है। साइबर सुरक्षा और डेटा गोपनीयता भी गंभीर मुद्दे बनेंगे, खासकर तब जब चुनावी रणनीतियाँ बड़े पैमाने पर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भर होंगी।

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि संसाधन-संपन्न दल एआई और तकनीक में अधिक निवेश कर सकते हैं, जबकि छोटे और क्षेत्रीय दल पीछे रह सकते हैं, जिससे लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का संतुलन बिगड़ने का खतरा है। ऐसे में चुनाव आयोग और नीति-निर्माताओं की भूमिका बेहद अहम होगी।

डॉ. अतुल मलिमकराम का स्पष्ट मत है कि मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2028 में एथिकल एआई को चुनावी रणनीति का आधार बनाना समय की आवश्यकता है। एआई-निर्मित कंटेंट की स्पष्ट पहचान, डीपफेक पहचानने वाले टूल्स, सख्त कानूनी प्रावधान और प्रभावी निगरानी तंत्र जरूरी होंगे। साथ ही मतदाताओं की डिजिटल साक्षरता बढ़ाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

अंत में उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों, चुनाव आयोग, मीडिया, तकनीकी विशेषज्ञों और नागरिक समाज को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक लोकतंत्र को मजबूत बनाए, न कि भ्रम और अविश्वास की ओर ले जाए। पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिकता के साथ उपयोग किया गया एआई, मध्य प्रदेश के चुनावी लोकतंत्र के लिए एक सशक्त सहयोगी साबित हो सकता है।

 

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