मार्गशीर्ष मास में क्यों नहीं करते जीरे का सेवन? सिर्फ धार्मिक ही नहीं, वैज्ञानिक कारण भी जान लीजिए  

हिंदू पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष माह (अगहन) वर्ष का नौवां महीना होता है। यह महीना भगवान श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय माना गया है। श्रीमद्भगवद गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा है — “मासानां मार्गशीर्षोऽहम्” अर्थात् मैं सभी महीनों में मार्गशीर्ष हूं। इस कारण यह माह अत्यंत पवित्र और पूजनीय माना जाता है। इस दौरान विशेष नियमों और व्रतों का पालन करने की परंपरा है, जिनमें से एक है — जीरे का सेवन न करना।

धार्मिक मान्यता के अनुसार जीरे का सेवन वर्जित

शास्त्रों में मार्गशीर्ष मास को जप, तप और ध्यान का महीना बताया गया है। इस माह में शरीर और मन की शुद्धि के लिए तामसिक और उष्ण प्रवृत्ति वाले खाद्य पदार्थों से परहेज करने की सलाह दी गई है।
स्कंद पुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की आराधना के समय शुद्ध, सात्त्विक और ठंडी प्रवृत्ति वाला आहार ही ग्रहण करना चाहिए।
जीरा उष्ण (गर्म) प्रकृति का होता है, इसलिए इस मास में इसका सेवन वर्जित माना गया है ताकि शरीर और मन शांत अवस्था में रह सकें।

वैज्ञानिक कारण भी है पीछे

मार्गशीर्ष माह शीत ऋतु में आता है, जब शरीर का तापमान स्वाभाविक रूप से संतुलित रहता है। इस समय जीरे जैसे उष्ण पदार्थों का सेवन करने से शरीर में पित्त, एसिडिटी, और गैस की समस्या बढ़ सकती है।
आयुर्वेद के अनुसार, जीरा पाचन अग्नि को तीव्र करता है और शरीर में गर्मी बढ़ाता है। यही कारण है कि इस महीने जीरे का सेवन स्वास्थ्य की दृष्टि से भी नुकसानदायक हो सकता है।

 किन चीजों का करें सेवन

इस माह में सात्त्विक और ठंडी प्रवृत्ति वाले आहार जैसे फल, दूध, मूंग की दाल, और सादा भोजन ग्रहण करने की सलाह दी जाती है। इससे शरीर में संतुलन बना रहता है और मन ध्यान व भक्ति में एकाग्र होता है।

  डिस्क्लेमर:
यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक, धार्मिक और आयुर्वेदिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इनका उद्देश्य केवल परंपरागत आस्थाओं और उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लोगों को अवगत कराना है।

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