- रिपोर्ट – मनोज कुमार यादव
एटा:- जहां एक ओर सरकारें महिलाओं के अधिकारों और सशक्तिकरण के नाम पर बड़े-बड़े मंचों से भाषण दे रही हैं, वहीं दूसरी ओर धरना स्थल पर बैठी वही महिलाएं हक की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं। ये हैं आशा कार्यकर्ता — गांव-गांव जाकर गर्भवती महिलाओं, नवजात बच्चों और ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ संभालने वाली वे महिलाएं, जिनके दम पर ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन चलता है। लेकिन अफसोस, इन्हीं के साथ सबसे बड़ा अन्याय हो रहा है।
तीसरे दिन भी कलेक्टर धरना स्थल एटा पर धरना जारी है। “दाम कम, काम ज्यादा” की गूंज पूरे जिले में सुनाई दे रही है। इनका आक्रोश वाजिब है — जब दिन-रात काम करने वाली, हर घर दस्तक देने वाली, हर बीमार की चिंता करने वाली आशाएं अपने हक़ के लिए सड़कों पर उतरती हैं, तो ये सिर्फ़ मानदेय की मांग नहीं होती, बल्कि सम्मान और अस्तित्व की पुकार होती है।
सरकारें कागज़ों में “महिला सशक्तिकरण” के पोस्टर छाप रही हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि जिनके कंधों पर स्वास्थ्य व्यवस्था टिकी है, वे खुद आर्थिक और मानसिक शोषण का शिकार हैं। इनका मासिक मानदेय इतना कम है कि गुज़ारा मुश्किल है, ऊपर से काम का बोझ इतना अधिक कि शरीर और मन दोनों थक चुके हैं।
यह सवाल उठना लाज़मी है — क्या यही है महिला सशक्तिकरण? क्या सशक्तिकरण सिर्फ भाषणों और अभियानों तक सीमित रहेगा? अगर सरकारें वाकई महिलाओं को सशक्त देखना चाहती हैं, तो पहले उन “आशाओं” की पुकार सुनें जो ज़मीनी हकीकत में ‘उम्मीद की किरण’ बनकर देश की सेवा कर रही हैं।
