- रिपोर्ट- मनोज कुमार यादव
एटा थाना वह स्थान है जहाँ जनता अपनी समस्याएँ लेकर जाती है, न्याय और सुरक्षा की उम्मीद के साथ। लेकिन सोचने वाली बात है कि जब थाना स्वयं मूलभूत सुविधाओं से वंचित हो, तो वहाँ आने वाले फरियादियों की स्थिति कैसी होगी? थाना कोतवाली मलावन की तस्वीर यही सवाल खड़ा करती है।
थाना मलावन में सिर्फ एक हेंडपम्प ही पानी पीने का सहारा है। गंदगी और बढ़ते संक्रमण के इस दौर में हैंडपम्प का पानी कितना सुरक्षित है, यह किसी से छिपा नहीं है। यहाँ न्याय की गुहार लगाने आने वाले लोगों को सबसे पहले प्यास से जूझना पड़ता है।
विडंबना यह है कि शासन-प्रशासन गाँव-गाँव तक शुद्ध पेयजल पहुंचाने की योजनाओं का ढिंढोरा पीटता है, करोड़ों का बजट खर्च होता है, लेकिन पुलिस थाने जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों में ही शुद्ध पेयजल का अभाव है। फरियादी कई-कई घंटे अपनी शिकायत दर्ज कराने या कार्रवाई के इंतजार में बैठते हैं। ऐसे में प्यास लगने पर उन्हें स्वच्छ पानी तक न मिलना, प्रशासन की लापरवाही को उजागर करता है।
यह सवाल भी उठता है कि थाने के कर्मचारी स्वयं किस व्यवस्था का सहारा लेते होंगे? यदि वे भी उसी हेंडपम्प पर निर्भर हैं, तो यह स्थिति और गंभीर है। जहाँ न्याय की रक्षा करने वाले बैठे हों, वहाँ मूलभूत सुविधाओं का इस तरह अभाव होना केवल असंवेदनशीलता ही नहीं, बल्कि लापरवाही की पराकाष्ठा है।
जनता यह सवाल पूछने के लिए मजबूर है कि जब थानों में ही पेयजल की सुविधा नहीं, तो “जनसुनवाई” और “सुशासन” की बातें आखिर किसके लिए की जा रही हैं?
न्याय की तलाश में आने वाले फरियादियों को न्याय के साथ कम से कम शुद्ध पानी तो मिलना ही चाहिए।
