बिजली विभाग की ‘बंदे मातरम एक्सप्रेस’ : स्मार्ट मीटरों की रफ्तार से बढ़ा ब्लड प्रेशर…

  • रिपोर्ट: सुकेश पांडेय

बिजली विभाग ने शहर की जनता को ‘स्मार्ट’ कहकर जो मीटर सौंपा है, वह अब उपभोक्ताओं की “नींद और जेब” दोनों उड़ा रहा है। जिन घरों में ये स्मार्ट मीटर लगाए गए हैं, वहां बिजली की खपत नहीं बल्कि ‘मीटर की उड़ान’ चर्चा में है।

“स्मार्ट मीटर की रफ्तार अब बंदे मातरम एक्सप्रेस से तुलना” पाने लगी है। उपभोक्ता कह रहे हैं, “बिजली नहीं जल रही, जेब जल रही है!”

हजारों उपभोक्ता इन दिनों परेशान हैं। जिन उपभोक्ताओं का दो कमरों का मकान है जिसमें केवल चार सदस्य रहते हैं उनके यहां का आलम है कि जहां सामान्य दिनों में 2-3 यूनिट प्रतिदिन की खपत होती थी वहां अब स्मार्ट मीटर लगते ही सिर्फ दो दिन में 72 यूनिट बिजली की खपत दर्शा दी गई! “ऐसे तो महीने भर का बिल कई गुना हो जाएगा।” पीड़ित उपभोक्ता का कहना है। उन्होंने इस अन्याय के खिलाफ प्रशासन को शिकायती पत्र भी सौंपा है।

शहरवासियों का प्रश्न है कि आखिर सरकार किस नीति के तहत बार-बार मीटर बदलने का खेल खेल रही है? पहले एनालॉग मीटर, फिर डिजिटल और अब स्मार्ट मीटर। लेकिन स्मार्ट के नाम पर “सिर्फ मीटर स्मार्ट है, सिस्टम नहीं” । उपभोक्ताओं का यह भी कहना है कि आखिर सरकार और विभाग को बार-बार मीटर बदलवाने में क्या ‘फील गुड’ महसूस हो रहा है?

शहर में स्मार्ट मीटर लगने के बाद किसी भी घर की पूर्व खपत की तुलना नहीं की जा रही, न ही कोई तकनीकी निरीक्षण। सीधे मीटर बदला जा रहा है और उपभोक्ता को हर महीने नई मार दी जा रही है। बिजली विभाग की लापरवाही और मनमानी अब आम जनता के लिए भविष्य का डर बन चुकी है। लोकल संगठनों और उपभोक्ताओं का मानना है कि “इस पूरी प्रक्रिया में कहीं न कहीं बड़ी कंपनियों और विभागीय मिलीभगत” की बू आ रही है। प्रश्न यह है कि जब पहले के मीटर ठीक चल रहे थे तो बार-बार उन्हें बदलने की ज़रूरत क्या है? क्या यह किसी विशेष कंपनी को फायदा पहुंचाने का ‘स्मार्ट’ खेल है?

इस खेल का जनता में अब धीरे-धीरे आक्रोश और विरोध बढ़ता ही जा रहा है, परन्तु जनता विवश है करे तो क्या करे। कहीं भी कोई भी सुनवाई नहीं है। आने वाले समय में ये स्थिति कहीं बिजली कर्मियों तथा विभाग के लोगों के लिए विस्फोटक न हो जाए, कही उनको जनता के आक्रोश का सामना न करना पड़ जाए, डर इस बात का है।

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