जिस देश में गुरुओं को शिष्यों के अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरना पड़े तो, पूरी सभ्यता शर्मिंदा होती है

  • संवाददाता- मनोज कुमार यादव

हमारा देश भारत, जिसे कभी “सोन की चिड़िया” और “विश्वगुरु” कहा जाता था, आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ शिक्षा, शिक्षक और शिष्य तीनों ही संघर्ष की अग्निपरीक्षा से गुजर रहे हैं। आज का यह विडंबनापूर्ण दृश्य है कि जिन गुरुओं को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, वे अपने ही शिष्यों के अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हो गए हैं। और यह भी दुर्भाग्य की बात है कि उन्हें गिरफ्तारी तक झेलनी पड़ती है।

गुरु वह होता है जो अंधकार में दीपक बनता है, जो अपने शिष्य को केवल पढ़ाता नहीं, बल्कि जीवन जीने की राह दिखाता है। लेकिन जब वही गुरु सड़कों पर नारे लगाता दिखे, लाठियाँ खाए, और पुलिस की गाड़ियों में ठूँस कर ले जाया जाए — तो यह सिर्फ शिक्षा व्यवस्था पर नहीं, पूरे समाज पर एक करारा तमाचा है।

गुरु जब अपने शिष्य की आवाज़ बनता है, तो उसे ‘राजनीतिक विरोधी’ मानकर गिरफ्तार कर लिया जाता है। क्या यही है “गुरु ब्रह्मा” की संस्कृति?

सरकारें अगर शिक्षकों की बात नहीं सुनतीं, अगर शिष्यों को उनके हक नहीं दिए जाते, तो विश्वगुरु बनने का सपना महज़ एक छलावा है। विश्वगुरु वो बनता है जो शिक्षा को पूजा की तरह माने, गुरु को ईश्वर का रूप और शिष्य को भविष्य की नींव।

गुरु जब न्याय की भीख माँगता है, तो पूरी सभ्यता शर्मिंदा होती है। अगर भारत को फिर से विश्वगुरु बनना है, तो पहले अपने गुरुओं को न्याय, सम्मान और स्वतंत्रता देनी होगी।
क्योंकि जिस देश में गुरु ही अपमानित हो, वहाँ ज्ञान, न्याय और विकास — तीनों ही दम तोड़ देते हैं।

 

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