- संवाददाता- मनोज कुमार यादव
हमारे देश में जब भी राष्ट्रवाद, आत्मनिर्भरता और स्वदेशी की बात होती है, तो सबसे पहले देश के बड़े नेता मंच पर खड़े होकर जनता को विदेशी चीज़ों का बहिष्कार करने की नसीहत देते हैं। ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘मेक इन इंडिया’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे नारों के साथ वे जनता से अपील करते हैं कि वे भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता दें, भारतीय संस्कृति को अपनाएं और विदेशी चमक-दमक से दूर रहें।
लेकिन दुखद वास्तविकता यह है कि यह उपदेश देने वाले वही नेता खुद विदेशी कंपनियों की महंगी गाड़ियों में घूमते हैं, उनकी सुरक्षा गाड़ियों के पूरे काफिले में स्वदेशी नाममात्र का होता है। उनके कपड़े, घड़ियाँ, मोबाइल, यहां तक कि जूते भी विदेशी ब्रांड के होते हैं। और जब गर्मी की छुट्टियाँ आती हैं तो वे अपने बच्चों को ‘देश की सुंदरता’ दिखाने के बजाय यूरोप, दुबई या अमेरिका की सैर कराने निकल पड़ते हैं।
यह दोहरी नीति सवाल खड़ा करती है — क्या स्वदेशी का संदेश केवल आम जनता के लिए है? क्या नेताओं का विदेशी चीज़ों के प्रति आकर्षण उन्हें दोहरे मापदंड वाला नहीं बनाता?
जनता जिनसे प्रेरणा लेती है, अगर वे खुद ही अपने जीवन में ‘स्वदेशी’ को नहीं उतारेंगे तो उनका संदेश खोखला लगेगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ‘स्वदेशी अपनाओ’ अब एक नारा बन गया है, जिसे चुनावी भाषणों और सोशल मीडिया पोस्टों में भुनाया जाता है, जबकि जमीन पर इसका पालन करने वाले खुद नेता नहीं होते।
जब तक देश के नेता और प्रभावशाली व्यक्ति खुद उदाहरण नहीं बनेंगे, तब तक ‘स्वदेशी अपनाओ’ जैसे अभियान केवल एक प्रचार भर बन कर रह जाएंगे। जनता को उपदेश देने से पहले खुद को उस राह पर चलाना होगा, तभी स्वदेशी वास्तव में राष्ट्रीय चेतना बनेगा, न कि केवल एक दिखावा।
