बीड (महाराष्ट्र), 18 फरवरी 2026: महाराष्ट्र के बीड ज़िले के गांवों से एक बेहद चिंताजनक सामाजिक तस्वीर सामने आई है, जहां बड़ी संख्या में युवा महिलाएं हिस्टेरेक्टॉमी (गर्भाशय निकालने की सर्जरी) करवा रही हैं। एक्टिविस्ट और प्रभावित महिलाओं पर की गई स्टडीज़ बताती हैं कि इसके पीछे गहरे सामाजिक और आर्थिक कारण जुड़े हुए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में बीड ज़िले में 4,500 से अधिक युवा महिलाओं की कथित तौर पर गैर-ज़रूरी हिस्टेरेक्टॉमी की गई है। यह आंकड़ा ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था और श्रम परिस्थितियों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
दर्द से शुरू होकर सर्जरी तक की कहानी
रिपोर्ट के अनुसार, पुष्पा (बदला हुआ नाम) नाम की एक महिला किसान, जो दो बच्चों की मां हैं, 26 वर्ष की उम्र में अत्यधिक ब्लीडिंग और पेट दर्द से परेशान थीं। दो वर्षों तक दवा लेने के बाद डॉक्टर ने उन्हें सर्जरी की सलाह दी। अंततः उन्होंने गर्भाशय निकलवाने का फैसला किया। उनका कहना है कि यह निर्णय आसान नहीं था, लेकिन लगातार दर्द के कारण काम पर असर पड़ रहा था।
सर्जरी के बाद उन्हें हार्मोनल असंतुलन और वजन बढ़ने जैसी समस्याओं का भी सामना करना पड़ा।
दो बड़े कारण: शोषण और मजदूरी की मजबूरी
स्टडीज़ के अनुसार, महिलाओं के ‘गर्भाशय-रहित’ होने के पीछे दो मुख्य कारण सामने आए हैं—
पहला, कुछ मामलों में डॉक्टरों द्वारा डर दिखाकर महंगी सर्जरी की सलाह देना, जिससे निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में मुनाफा कमाया जा सके।
दूसरा, पीरियड्स के कारण काम में रुकावट आना। बीड सूखा-ग्रस्त इलाका है, जहां गन्ना काटना आय का प्रमुख स्रोत है। अक्टूबर से मार्च तक चलने वाले सीजन में महिलाएं सुबह 4 बजे उठकर घर का काम निपटाती हैं और सुबह 6 बजे से शाम 6:30 बजे तक खेतों में कठिन श्रम करती हैं। भारी गन्ने के बंडल सिर पर उठाना, लंबे समय तक झुककर काम करना—इन सबके बीच मासिक धर्म को कई महिलाएं काम में बाधा के रूप में देखती हैं।
कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम और आर्थिक दबाव
रिपोर्ट में बताया गया है कि बीड में गन्ना काटने का काम ठेकेदारों के जरिए कराया जाता है। ठेकेदार दंपत्ति को एक यूनिट के रूप में काम पर रखते हैं और साल भर के लिए करीब 1.5 लाख रुपये एडवांस देते हैं। एडवांस लेने के बाद रोज काम पर उपस्थित रहना जरूरी होता है। ऐसे में कई महिलाएं पीरियड्स के दौरान छुट्टी से बचने के लिए खुद ही हिस्टेरेक्टॉमी का फैसला कर लेती हैं, ताकि उनकी आमदनी प्रभावित न हो।
कैंसर से बचाव का डर
कुछ महिलाओं ने बताया कि डॉक्टरों ने उन्हें यह कहकर सर्जरी के लिए राजी किया कि इससे भविष्य में कैंसर का खतरा कम हो जाएगा। कई मामलों में यह भी कहा गया कि बच्चे के जन्म के बाद गर्भाशय की जरूरत नहीं रहती, जिससे महिलाओं को जल्दी ऑपरेशन कराने के लिए प्रेरित किया गया।
गंभीर सामाजिक सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल स्वास्थ्य से जुड़ा नहीं, बल्कि श्रम शोषण, स्वास्थ्य जागरूकता की कमी, निजी चिकित्सा प्रणाली की निगरानी और ग्रामीण आर्थिक ढांचे से भी गहराई से जुड़ा है। बीड की यह स्थिति बताती है कि किस तरह आर्थिक मजबूरी और गलत सलाह मिलकर महिलाओं को जीवनभर के लिए प्रभावित करने वाला फैसला लेने पर मजबूर कर सकती है।
यह मुद्दा अब नीति-निर्माताओं और स्वास्थ्य प्रशासन के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है।
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