दस साल पहले हुए जाट आरक्षण आंदोलन की बुझी हुई राख में भी क्यों चिंगारी ढूंढ कर दोबारा सुलगाया जा रहा है?

गुस्ताखी माफ हरियाणा – पवन कुमार बंसल

हमारे जागरूक पाठक पत्रकार महेश कौशिक के सौजन्य से।
जाट आरक्षण की आग, नेताओं के भाग—सियासत की चाल और समाज का दाग।

2016 का जाट आरक्षण आंदोलन हरियाणा की राजनीति और समाज दोनों के लिए ऐसा मोड़ साबित हुआ, जिसने कई सवाल खड़े किए और कई चेहरे बेनकाब भी किए। आरक्षण की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे ऐसी आग में बदल गया, जिसने न केवल सड़कों और बाजारों को जलाया बल्कि समाज और राजनीति के रिश्तों को भी झुलसा दिया।

शुरुआत में जाट समाज सरकार से अपने अधिकार की मांग कर रहा था। धरने-प्रदर्शन हो रहे थे, लेकिन नेतृत्व बिखरा हुआ था। अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग नेता आंदोलन को दिशा दे रहे थे और हर किसी की मंशा भी अलग दिख रही थी। यहीं से आंदोलन का रास्ता बदलने लगा। कुछ नेताओं ने इस मांग को समाज की प्रतिष्ठा का सवाल बना दिया, तो कुछ ने अपने राजनीतिक हिसाब-किताब साधने शुरू कर दिए।

धीरे-धीरे हालात ऐसे बने कि आरक्षण की लड़ाई भावनाओं और टकराव में बदल गई। स्कूल, दुकानें, बसें, शोरूम और सिनेमा हॉल तक आग की भेंट चढ़ गए। रोहतक जैसे शहरों में आंदोलन ने तांडव का रूप ले लिया। एक किसान समाज, जिसके बेटे देश की सीमाओं पर खड़े हैं, वही समाज अचानक कटघरे में खड़ा कर दिया गया।

सबसे बड़ा नुकसान समाज की छवि और नेताओं की राजनीति दोनों को हुआ। उस समय सत्ता और विपक्ष के कई बड़े चेहरे इस आग की लपटों में झुलस गए। कैप्टेन अभिमन्यु, ओम प्रकाश धनखड़, भूपिंदर सिंह हुड्डा और दीपेंदर सिंह हुड्डा जैसे नाम उस समय की राजनीति के केंद्र में आ गए। जिसका परिणाम यह रहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में हुड्डा परिवार के साथ विधानसभा चुनाव में मंत्री होते हुए भी कैप्टेन अभिमन्यु और ओम प्रकाश धनखड़ भी चुनाव हार गए। कुछ चुनाव जीतकर आगे निकल गए, लेकिन कुछ नेताओं की राजनीति आज तक उस दौर की राख से बाहर नहीं निकल पाई।

अब दस साल बाद फिर वही सवाल उठ रहा है—आखिर उस हिंसा का असली मास्टरमाइंड कौन था? उस समय के वित्त मंत्री कैप्टेन अभिमन्यु की कोठी जलाने के मामले में दर्ज मुकदमों के बाद अब कुछ युवा सामने आकर नए-नए वीडियो और दावे कर रहे हैं। खाप पंचायतों की मध्यस्थता, युवाओं की माफी और केस वापसी के बाद लगा था कि यह अध्याय खत्म हो चुका है, लेकिन अब यह आग फिर से सुलगाई जा रही है।

विडंबना यह है कि जिन घटनाओं पर समय की धूल जम चुकी थी, उन्हें अब फिर से कुरेदा जा रहा है। सवाल उठता है—क्या यह सच में साजिशकर्ताओं का पर्दाफाश है या फिर सहानुभूति की राजनीति?

सच यही है कि जो हुआ वह गलत था। लेकिन इतिहास का एक कटु सत्य यह भी है कि कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जिनका पूरा सच सामने आ जाए तो कई चेहरे बेनकाब हो जाते हैं और कई रिश्ते टूट जाते हैं। शायद इसलिए कभी-कभी सच का अधूरा रह जाना ही समाज के लिए बेहतर होता है।

लेकिन राजनीति का नियम अलग है—यहां बुझी हुई राख में भी चिंगारी ढूंढ ली जाती है। और जब सियासत को जरूरत हो, तो पुरानी आग भी फिर से भड़काई जा सकती है।

दुमछला:
तीन दिन तक हरियाणा में कोई सरकार नहीं थी। सेना की मौजूदगी में थाने लूटे गए और यहां तक कि जजों को भी निजी निवास में शरण लेनी पड़ी। कायदे से तत्कालीन मनोहर लाल की अध्यक्षता वाली सरकार को बर्खास्त किया जाना चाहिए था, लेकिन मनोहर लाल को मोदी का आशीर्वाद प्राप्त था।

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