नई दिल्ली, 18 फरवरी 2026: सनातन धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना से रखती हैं। इस दिन महिलाएं विधि-विधान से वट वृक्ष (बरगद) का पूजन करती हैं और माता सावित्री की कथा का श्रवण करती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वट सावित्री व्रत वर्ष में दो बार आता है—एक ज्येष्ठ अमावस्या के दिन और दूसरा ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन। हालांकि ज्येष्ठ अमावस्या का व्रत अधिक प्रचलित और महत्वपूर्ण माना जाता है।
कब है वट सावित्री व्रत 2026
पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ अमावस्या तिथि 16 मई 2026 को सुबह 5 बजकर 11 मिनट पर शुरू होगी और 17 मई 2026 को सुबह 1 बजकर 30 मिनट पर समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार, वट सावित्री व्रत 16 मई 2026 (शनिवार) को रखा जाएगा।
इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 12 मिनट से लेकर 8 बजकर 24 मिनट तक रहेगा। इस अवधि में वट वृक्ष का पूजन करना विशेष फलदायी माना गया है।
वट सावित्री व्रत का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में इस व्रत को अत्यंत फलदायी माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहता है। पौराणिक कथा के अनुसार, माता सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस प्राप्त किए थे, इसलिए यह व्रत पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि से जुड़ा हुआ है।
वट वृक्ष की होती है विशेष पूजा
इस दिन महिलाएं वट वृक्ष की पूजा करती हैं और उसके चारों ओर धागा बांधकर परिक्रमा करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है—जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का निवास माना जाता है।
व्रत के दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार कर पूजा करती हैं, कथा सुनती हैं और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करती हैं। विशेष रूप से बिहार और उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में इस व्रत को बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से दांपत्य जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है तथा परिवार पर देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
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