- रिपोर्ट – मनोज कुमार यादव
आज़ादी के बाद शिक्षा को हर नागरिक का अधिकार माना गया और सरकारी स्कूलों को इस अधिकार की सबसे मज़बूत नींव के रूप में स्थापित किया गया। किताबें, यूनिफ़ॉर्म, मिड-डे मील और शुल्कमुक्त शिक्षा जैसी सुविधाएँ देकर सरकार ने हर बच्चे तक शिक्षा पहुँचाने की कोशिश की। फिर भी, आज गाँव से लेकर शहर तक एक सच्चाई स्पष्ट नज़र आती है—लोग सरकारी स्कूलों से दूरी बना रहे हैं।
लोगों का झुकाव निजी स्कूलों की ओर सिर्फ़ इसलिए नहीं है कि वहाँ अंग्रेज़ी माध्यम या चमचमाती बिल्डिंग है, बल्कि इसलिए भी है कि सरकारी स्कूलों में कई जगह अनुशासन, शिक्षण पद्धति और जवाबदेही का स्तर गिरा है। शिक्षक चाहे योग्य हों, लेकिन कई बार उनमें वह प्रेरक ऊर्जा और नियमितता नहीं दिखती जो बच्चों और अभिभावकों का भरोसा जीत सके।
एक समय था जब सरकारी स्कूल के शिक्षक गाँव के सबसे सम्मानित लोग माने जाते थे। उनका पढ़ाया छात्र ज़िंदगी में आगे बढ़ता था। आज, कई जगह यह भरोसा टूटा है—अभिभावक सोचते हैं कि अगर बच्चे का भविष्य बनाना है तो उसे निजी स्कूल में ही भेजना होगा, चाहे इसके लिए कर्ज़ ही क्यों न लेना पड़े।
सरकारी स्कूलों से दूरी केवल शिक्षा का संकट नहीं है, बल्कि यह समाज में आर्थिक और अवसरों की असमानता को और गहरा कर रही है। जो परिवार निजी स्कूलों का खर्च नहीं उठा सकते, वे मजबूरन गुणवत्ता में पिछड़ जाते हैं। शिक्षा का यह दोहरा ढाँचा आने वाले समय में सामाजिक संतुलन को भी प्रभावित करेगा।
सरकारी स्कूलों की इमारतें, किताबें और योजनाएँ पर्याप्त हैं, बस उनमें जीवन डालने की ज़रूरत है। शिक्षकों की जवाबदेही बढ़ाना, आधुनिक शिक्षण पद्धतियाँ अपनाना, तकनीक का सही उपयोग करना और सामुदायिक निगरानी लाना—यही वो कदम हैं जो अभिभावकों का भरोसा लौटा सकते हैं।
