- संवाददाता – मनोज कुमार यादव
सरकार ने इस वर्ष फिर से बड़े गर्व के साथ घोषणा की है कि प्रदेश भर में लाखों नए पेड़ लगाए जाएंगे। यह पहल निश्चित रूप से कागज़ पर हरियाली का संदेश देती है, लेकिन सवाल यह है कि पिछले साल जो करोड़ों पौधे लगाए गए थे, उनका क्या हुआ? क्या किसी ने यह जानने की कोशिश की कि उनमें से कितने ज़िंदा बचे हैं, और कितनों की परछाईं भी अब नहीं दिखती?
पेड़ लगाना जितना आसान है, उसे बचाना और बढ़ाना उतना ही कठिन और जिम्मेदारी भरा कार्य है। हर साल वृक्षारोपण अभियान अखबारों की सुर्खियां बनते हैं, मंत्री जी से लेकर छोटे अफसर तक फावड़ा और पानी लेकर फोटो खिंचवाते हैं, लेकिन उसके बाद क्या होता है? न पौधे को पानी मिलता है, न सुरक्षा। फिर अगली बरसात में दोबारा वही नाटक, वही संकल्प, और वही पौधे… जो कुछ महीने में सूखकर मिट्टी में समा जाते हैं।
पेड़ लगाना केवल एक “लक्ष्य” पूरा करने का साधन बन गया है। पंचायतों से लेकर जिले तक हर अधिकारी की एक संख्या तय होती है—इतने पौधे लगाने हैं। गड्ढा खोदो, पौधा लगाओ, फोटो लो, रिपोर्ट भेजो। इसके बाद न देखभाल की व्यवस्था होती है, न कोई मॉनिटरिंग।
अगर सरकारी रिकॉर्ड खंगालें, तो लाखों पौधे लगाए गए बताए जाएंगे, लेकिन गांव-गांव जाकर देखने पर शायद ही उनमें से कुछ नजर आएं। कोई पूछे कि उन पौधों को बचाने की जिम्मेदारी किसकी थी? प्रधान? वन विभाग? ग्राम पंचायत? हर कोई उंगली एक-दूसरे पर रख देता है। और पौधा… वो चुपचाप सूख जाता है।
