अयोध्या का सच: देविंद्र स्वरूप की जुबानी और राजीव गांधी की भूमिका पर सवाल

गुस्ताखी माफ़ हरियाणा – पवन कुमार बंसल

अयोध्या।अयोध्या विवाद और राम मंदिर आंदोलन को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विमर्श के बीच आरएसएस के पूर्णकालिक स्वयंसेवक एवं वरिष्ठ पत्रकार देविंद्र स्वरूप की पुस्तक “अयोध्या का सच” एक बार फिर चर्चा में है। इस पुस्तक में किए गए दावों के आधार पर यह प्रश्न उठता है कि विवादित ढांचे (बाबरी मस्जिद) पर से ताला खोलने और रामलला के दर्शन के लिए मार्ग प्रशस्त करने का निर्णय तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की इच्छा और आदेश से लिया गया था।

लेखक के अनुसार, यह तथ्य पहले भी जनचर्चा में रहा है, लेकिन संघ से जुड़े स्वयंसेवक द्वारा इसकी पुष्टि किए जाने से बहस को नई दिशा मिलती है। यदि यह स्वीकार किया जाए, तो राम मंदिर आंदोलन की नींव रखने का श्रेय राजीव गांधी को जाता है। इसके विपरीत, वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में मंदिर निर्माण और 22 जनवरी को रामलला की मूर्ति स्थापना का श्रेय मुख्यतः भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया जा रहा है, जबकि राजीव गांधी की भूमिका पर अपेक्षाकृत कम चर्चा दिखाई देती है।

लेखक पवन कुमार बंसल के अनुसार, हाल ही में दिल्ली प्रवास के दौरान उन्होंने कबाड़ में बिकने वाली पुस्तकों के बीच देविंद्र स्वरूप की यह पुस्तक देखी और तुरंत खरीदी। ग्रंथ अकादमी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित 275 पृष्ठों की इस पुस्तक में लेखक ने अयोध्या आंदोलन के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला है। देविंद्र स्वरूप इससे पूर्व “संघ बीज से वृक्ष”, “संघ राजनीति और मीडिया”, “हमारे रज्जू भैया”, “जाति-विहीन समाज का सपना” और “राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास” जैसी चर्चित पुस्तकें भी लिख चुके हैं।

पुस्तक के एक अध्याय “अयोध्या ‘सत्ता’ का नहीं, ‘आस्था’ का एजेंडा है” में लेखक सवाल उठाते हैं कि क्या तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह द्वारा यह तथ्य सार्वजनिक नहीं किया गया था कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आदेश पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के सहयोग से विश्व हिंदू परिषद ने जन्मभूमि स्थल पर शिलान्यास किया था। लेखक के अनुसार, इन घटनाओं से जुड़े दस्तावेजों को दबा पाना अब संभव नहीं है।

पुस्तक में कम्युनिस्ट दलों, मीडिया और मुलायम सिंह यादव की भूमिका पर भी तीखी टिप्पणियां की गई हैं। जनसत्ता के तत्कालीन प्रधान संपादक प्रभाष जोशी की लेखनी का उल्लेख करते हुए लेखक लिखते हैं कि अयोध्या आंदोलन के दौरान संघ परिवार और विशेषकर विश्व हिंदू परिषद के प्रति उनका आक्रोश स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वहीं मुलायम सिंह यादव के संदर्भ में लेखक उनकी राजनीति को जातिवाद और मुस्लिम कट्टरवाद से प्रेरित बताते हैं।

भाजपा की राजनीति पर टिप्पणी करते हुए देविंद्र स्वरूप लिखते हैं कि भाजपा का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि सत्ता के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को पुष्ट करना होना चाहिए।

लेख के अंत में पवन कुमार बंसल ने एक समसामयिक प्रश्न भी उठाया है कि जब अयोध्या में अदाणी और अंबानी जैसे उद्योगपतियों को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया, तो हरियाणा की जिंदल स्टील समूह की प्रमुख सावित्री जिंदल को क्यों नहीं।
पचास वर्षों से पत्रकारिता से जुड़े और “खोजी पत्रकारिता क्यों और कैसे” पुस्तक के लेखक पवन कुमार बंसल से संपर्क pawanbansal2@gmail.com
पर किया जा सकता है।

यह लेख अयोध्या मुद्दे पर इतिहास, राजनीति और मीडिया की भूमिका को नए सिरे से देखने की जरूरत पर जोर देता है और पाठकों को विचार के लिए आमंत्रित करता है।

 

khabre junction

Leave A Reply

Your email address will not be published.