- रिपोर्ट – मनोज कुमार यादव
एटा विकास खण्ड सकीट के ग्राम पंचायत रजपुरा का हाल देखकर मुख्यमंत्री फेलो का निरीक्षण किसी आईने की तरह साबित हुआ, जिसमें गांव की असलियत साफ नज़र आ गई। पंचायत भवन, जो ग्रामीणों की समस्याओं और योजनाओं का समाधान केंद्र होना चाहिए था, उसके सामने भैंसें बंधी मिलीं। यह नजारा केवल लापरवाही का प्रतीक नहीं बल्कि जिम्मेदारों की मानसिकता भी दर्शाता है कि उनके लिए पंचायत भवन भी किसी पशुशाला से ज्यादा महत्व नहीं रखता।
निरीक्षण में शौचालय बंद मिले, गलियां कीचड़ और गंदगी से पटी हुई दिखीं। यह स्थिति बताती है कि स्वच्छ भारत अभियान जैसे कार्यक्रम केवल कागज़ों और भाषणों तक सीमित रह गए हैं। गांव का आम नागरिक बदबू और कीचड़ में जीने को मजबूर है, जबकि प्रधान और सचिव अपने दायित्वों से बेखबर आराम फरमा रहे हैं।
ग्राम प्रधान और सचिव की यह घोर लापरवाही सवाल खड़े करती है – आखिर जिम्मेदारी कब तय होगी? सरकारी योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन उसका लाभ ज़मीन पर नज़र क्यों नहीं आता? पंचायत भवन का ताला बंद और सामने भैंसों की मौजूदगी यह साफ कर देती है कि ग्रामीणों की समस्याएं सुनने वाला कोई नहीं।
यह लापरवाही अब केवल अनदेखी या गलती नहीं बल्कि जनता के विश्वास से खिलवाड़ है। सरकार को चाहिए कि ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई करे। प्रधान और सचिव की जवाबदेही तय हो, तभी गांवों में सुधार की उम्मीद की जा सकती है।
