सिरसा, 28 दिसंबर (एम. पी. भार्गव)। समाजसेवी प्रो. संजीव कालड़ा ने सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाश पर्व के अवसर पर प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाश पर्व को साहस, त्याग और धर्मरक्षा की प्रेरणा देने वाला बताया।
अपने जारी बयान में प्रो. संजीव कालड़ा ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह जी सिखों के दसवें और अंतिम गुरु थे। श्री गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान के उपरांत 11 नवंबर 1675 को उन्होंने गुरु गद्दी संभाली। गुरु गोबिंद सिंह जी एक महान योद्धा, चिंतक, कवि, भक्त और आध्यात्मिक नेता थे, जिनका जीवन मानवता और धर्म की रक्षा के लिए समर्पित रहा।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1699 में बैसाखी के पावन अवसर पर गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की, जिसे सिख इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। गुरु गोबिंद सिंह जी ने पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब को पूर्ण कर उन्हें गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया, जिससे सिख परंपरा को स्थायी दिशा मिली।
प्रो. कालड़ा ने बताया कि ‘बचित्तर नाटक’ गुरु गोबिंद सिंह जी की आत्मकथा है, जो दशम ग्रंथ का एक महत्वपूर्ण भाग है और उनके जीवन से संबंधित जानकारी का प्रमुख स्रोत मानी जाती है। उन्होंने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने अन्याय, अत्याचार और पापों के अंत तथा धर्म की रक्षा के लिए मुगल शासकों के साथ 14 युद्ध लड़े।
उन्होंने आगे कहा कि धर्म और सत्य की रक्षा के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने पूरे परिवार का बलिदान दिया, इसी कारण उन्हें ‘सरबंसदानी’ की उपाधि से सम्मानित किया जाता है। जनसाधारण में वे कलगीधर, दशमेश, बाजांवाले जैसे अनेक नामों से भी जाने जाते हैं। प्रो. कालड़ा ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन आज भी समाज को सत्य, साहस और बलिदान के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
