‘गुस्ताखी माफ हरियाणा’ पर तहलका में समीक्षा: पवन कुमार बंसल की कलम ने फिर बिखेरा व्यंग्य का रंग

गुस्ताखी माफ हरियाणा-पवन कुमार बंसल

हरियाणा की राजनीति पर मेरी तीसरी और ताजा किताब “गुस्ताखी माफ हरियाणा” की चर्चित पत्रिका तहलका में समीक्षा। पढ़िए और खुश होइए।

पवन कुमार बंसल उन पत्रकारों में हैं जिन्होंने जमीनी स्तर से पत्रकारिता की। उनकी पत्रकारिता में जीवंतता है, इसलिए वे गंभीर राजनेताओं के उन पहलुओं पर भी अपनी कलम चला देते हैं, जो पाठक को चकित ही नहीं करते बल्कि गुदगुदाते भी हैं। वहीं राजनेता और उनके गुट दुविधा में रहते हैं।

बंसल का नाम खोजी पत्रकारिता करने वालों में खास महत्वपूर्ण है। जींद, रोहतक व चंडीगढ़ में रहते हुए उन्होंने जो रिपोर्टिंग की, उसका स्थान पत्रकारिता के अध्याय में महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपनी रिपोर्टिंग में नरवाना और कालांवाली में जहरीली शराब कांड की कई अनसुलझी गुत्थियां सुलझाई थीं, जिसके कारण उनका काफी नाम हुआ था।

बंसल की तीसरी पुस्तक “गुस्ताखी माफ हरियाणा” अभी हाल में आई है। हरियाणा का रजत जयंती समारोह एक नवंबर तक चलेगा। हरियाणा को किस तरह इसके नेताओं ने एक स्वरूप दिया है और पूरे देश में चर्चा दिलाई, इसे जानना न सिर्फ हरियाणा बल्कि पूरे देश को इस पुस्तक के जरिए जानना उपयोगी रहेगा। इस पुस्तक को एक बार उठाने के बाद इसे छोड़ते नहीं बनेगा।

लेकिन यह बात भी अनोखी है कि आप प्रतिक्रिया और रुचि की जानकारी के साथ एक प्रदेश के तरह-तरह के नेताओं में विकसित बारीक व्यंग्य का पुट भी जानते हैं। आपको लगता है कि यह किताब अच्छी है और इसे जल्दी से जल्दी पूरा पढ़ ही लेना चाहिए।

पवन की दूसरी किताबें हैं— “हरियाणा के लालों के सबरंगे किस्से” (1998) और “खोजी पत्रकारिता क्यों और कैसे” (2009)। ये भी खासी चर्चित रहीं। एक से बढ़कर एक किताबें पवन ने अपनी कलम से उकेरीं और पाठकों ने कभी उन्हें हल्के में नहीं लिया। इसी कारण तीसरी किताब “गुस्ताखी माफ हरियाणा” वे रच सके और एक राज्य और उसके राजनेताओं के महत्व को उनके अंदाज-ए-बयां के साथ पेश कर सके।

इस लेखन की खासियत है मानो खुद हरियाणा अपने बारे में और अपने जननायकों के बारे में बता रहा है और ठहाके भी मार रहा है। सरल भाषा और विशिष्ट शैली में छपी यह किताब बहुत ही मनोहारी है। आप भी यह किताब पढ़िए, मुस्कराइए और अपने प्रदेश को जानिए।

 

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