सलाखों के पीछे बंद हैं लोग, उनके भीतर की दुनिया नहीं—कैदियों तक ‘सफ़र अपने अंदर का’ पहुंचाएंगी अलका…
पटना। जेल की ऊंची दीवारें किसी व्यक्ति की आवाजाही रोक सकती हैं, लेकिन क्या वे उसके विचारों को भी कैद कर सकती हैं?
क्या किसी कैदी के भीतर आत्मचिंतन की कोई जगह नहीं बचती?
क्या गलती और सजा के बाद इंसान की कहानी वहीं खत्म हो जाती है?
इन्हीं…
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