सुधा यादव लोक सभा चुनाव लड़ना नहीं चाहती थी, उन्हें मानेसर के एक्स सरपंच ओम प्रकाश यादव ने मनाया

गुस्ताखी माफ़ हरियाणा – पवन कुमार बंसल

बीजेपी पार्लियामेंटरी बोर्ड की सदस्य एवं पूर्व सांसद डॉ. सुधा यादव चुनाव लड़ना नहीं चाहती थीं। उन्हें मानेसर के पूर्व सरपंच ओम प्रकाश यादव ने मनाया। आइए, पूरी कहानी ओम प्रकाश यादव से ही जानिए—

डॉ. सुधा यादव जी की स्वर्गीय सास, श्रीमती संतोष जी से किया गया वादा आज पूरा होता देखकर मन अत्यंत प्रफुल्लित है।

दोस्तों, बात उन दिनों की है जब कारगिल युद्ध में डॉ. सुधा यादव जी के पति, शहीद सुखबीर सिंह की शहादत हुई। यह परिवार के लिए गहरा आघात था। उसी समय श्री लालकृष्ण आडवाणी जी ने डॉ. सुधा यादव जी को चुनाव लड़ने के लिए फोन किया, लेकिन डॉ. सुधा यादव जी और उनके परिवार ने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया।

इसके बाद डॉ. सुधा यादव जी ने सरकारी नौकरी की इच्छा जताई। उस समय हरियाणा में श्री ओमप्रकाश चौटाला जी की सरकार थी। सरकार ने डॉ. सुधा यादव जी को प्रोफेसर के पद पर नियुक्त कर खेड़की दौला, गुरुग्राम में पोस्टिंग दे दी।

उन दिनों मैं और स्वर्गीय राव करतार सिंह, चेयरमैन, खोड़ नौरंगपुर, रोज़ शाम को करीब दो घंटे बैठकर राजनीति पर चर्चा करते थे। मैंने राव करतार जी से कहा कि अगर डॉ. सुधा यादव जी को मनाया जाए तो कैसा रहेगा। इस पर चेयरमैन साहब ने कहा—“सोने पर सुहागा।”

अगले दिन मैं एनएसजी स्थित डॉ. सुधा यादव जी के टाइप-4 मकान पर गया। वहां उनकी सास, स्वर्गीय श्रीमती संतोष जी मिलीं। मैंने कुछ नहीं कहा, बस अपना फोन नंबर छोड़ आया। उसी शाम डॉ. सुधा यादव जी का फोन आया। मिलने का समय तय हुआ और मैं उनसे मिलने गया।

अपनी बात रखने पर डॉ. सुधा यादव जी ने कहा, “आप लोग जो पैसे मेरे पति की शहादत में मिले हैं, उन्हें खर्च करवाना चाहते हैं।” मैंने कहा, “नहीं जी, जीत-हार तो भविष्य की बात है, लेकिन चुनाव में आपका एक रुपया भी खर्च नहीं होने देंगे।”

इस पर डॉ. सुधा यादव जी ने एक दिन का समय मांगा कि वह परिवार और रिश्तेदारों से सलाह कर लें। यह सारी बातचीत उनकी सास सुन रही थीं। जब मैं बाहर निकल रहा था, तो दरवाज़े के बाहर स्वर्गीय संतोष जी अपने पोते-पोती—सिद्धार्थ यादव और सौम्या यादव—को लेकर खड़ी थीं। भारी मन से उन्होंने कहा, “बेटा, बड़ी मुश्किल से इस विवाद को शांत कराया था, अब तुम क्यों इन बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हो?”

मैंने कहा, “माता जी, हम इन दोनों के भविष्य के लिए ही यह कर रहे हैं। आप चिंता न करें।”

एक दिन बाद डॉ. सुधा यादव जी का फोन आया—उन्होंने कहा कि वह तैयार हैं। मैंने उनसे कहा कि पहले श्री लालकृष्ण आडवाणी जी से फोन पर बात कर उन्हें अवगत कराएं। डॉ. सुधा यादव जी ने आडवाणी जी से बात की, तो उन्होंने दिल्ली स्थित भाजपा कार्यालय में बायोडाटा जमा करने को कहा।

हम दोनों दिल्ली भाजपा कार्यालय गए और कागजात जमा कराए। तीसरे दिन डॉ. सुधा यादव जी की टिकट फाइनल हो गई। टिकट लेने भी हम दोनों ही गए थे। आगे की कहानी तो सब जानते हैं।

हमने डॉ. सुधा यादव जी की सास से जो वादा किया था—कि यह सब बच्चों के भविष्य के लिए कर रहे हैं—आज उसे पूरा होते देख मन को अपार खुशी होती है। आज जब मैं सिद्धार्थ यादव जी को राष्ट्रीय चैनलों पर राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में बहस करते देखता हूँ, तो दिल गर्व और संतोष से भर जाता है।

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