गुस्ताखी माफ हरियाणा – पवन कुमार बंसल
सांसारिक सुख भोगते हुए अपनी औकात में रहें, क्योंकि अंतिम पड़ाव मौत है, जहां खाली हाथ जाना है।
मेरे ड्राइंग रूम में एक पेंटिंग है, जो मुझे हमेशा प्रेरणा देती है। आज से तीस साल पहले एक कलाकार मित्र ने मुझे यह पेंटिंग भेंट की थी। वह आज भी मेरे ड्राइंग रूम में सुशोभित है और मुझे औकात में रहने की सीख देती है।
इस पेंटिंग में कलाकार ने जिंदगी के तीन पहलू दर्शाए हैं—जन्म के समय तोता टांगना, फिर विवाह के बाद भोग-विलास का जीवन और अंत में शिवजी का त्रिशूल, यानी मौत। क्रम से कलाकार ने तोता टांगने और विवाहित जीवन के बीच त्रिशूल, अर्थात मृत्यु, को दिखाकर यह संदेश दिया है कि सांसारिक सुख भोगते हुए भी इंसान को अपनी सीमाओं में रहना चाहिए, क्योंकि अंततः खाली हाथ ही जाना है।
जाने-माने पत्रकार और मेरे गुरु Prabhash Joshi एक गजल सुनाया करते थे—
“राम निरंजन प्यारा रे, अंजन सकल संसारा रे,
सखी वो घर सबसे न्यारा रे।”
उक्त पेंटिंग ने मुझमें कभी घमंड नहीं आने दिया। वैसे भी मुझ पर लक्ष्मी की बजाय सरस्वती की कृपा अधिक रही है।
प्रेम से दी गई भेंट की कोई कीमत नहीं हो सकती। मेरे पास एक थ्री-डी पेंटिंग भी है, जिसमें कुत्ता, बिल्ली और शेर अलग-अलग एंगल से दिखाई देते हैं। रोहतक के भगवान सिंह जी ने बड़े प्रेम से एक ड्रिफ्टवुड पेंटिंग भेंट की थी। मैंने उन्हें अमरूद के पेड़ की जड़ दी थी, जिसे उन्होंने कला का रूप देते हुए उसमें मगरमच्छ, दो सहेलियां और शेर उकेर दिए।
श्याम कटारिया द्वारा भेंट की गई पुस्तक “पत्रकारिता के असली इंसान” भी मेरे लिए विशेष महत्व रखती है।
पिछले दिनों एक मित्र ने कुछ पौधे भेंट किए और दूसरे मित्र ने फ्लावर पॉट दिया। मुझे यह सब अच्छा लगा। दुमछल्ला यह है कि मैंने तत्कालीन मुख्यमंत्री Bhajan Lal के कोटे का प्लॉट लेने का उपहार तो स्वीकार नहीं किया, लेकिन यदि कोई मुझे गुलदस्ता या पौधे भेंट करता है, तो मैं उसे सहर्ष स्वीकार करता हूं।
