सिरसा… जहां आसान नहीं भाजपा की राजनीतिक डगर

सिरसा (सी एम ग्रोवर प्रेसवार्ता) हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सैनी की कार्यशैली से प्रभावित भाजपाई संगठनात्मक ढांचे में सुधार के बढ़ते दिखाई दे रहे कदम से भाजपा के जनाधार में इजाफा नजर आ रहा है, मगर लोकसभा क्षेत्र सिरसा एक मात्र ऐसा क्षेत्र है, जहां संगठनात्मक ढांचा हिचकोले खा रहा है और जनाधार खिसक रहा है। हरियाणा के अस्तित्व में आने के 58 वर्ष में पहली बार भाजपा को वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में जीत हासिल हुई थी। उस समय भाजपा ने पूर्व आयकर कमिश्नर सुनीता दुग्गल को चुनाव मैदान में उतारा था,जिसे सभी नौ विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल हुई थी। सुनीता दुग्गल ने कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर को तीन लाख बीस हजार वोट से हराया था। अपनी पराजय का राजनीतिक बदला लेने के लिए अशोक तंवर ने भगवा कवच धारण कर सुनीता दुग्गल को टिकट से वंचित कर खुद भाजपा की टिकट हासिल कर चुनाव लडा, मगर पिछले दो बार की तरह इस बार भी मतदाताओं ने तव्वजो नहीं दी और वह सभी विधानसभा क्षेत्रों में लुढ़क गए। भाजपा को टिकट वितरण प्रक्रिया की चूक इतनी महंगी पड़ी कि मात्र छः महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में सिरसा और फतेहाबाद जिले में एक भी सीट नहीं मिली। पार्टी के संगठन और भाजपा के प्रति सोच रखने वालों को उस समय गहरा धक्का लगा,जब सिरसा विधानसभा से चुनाव लड रहे भाजपा के उम्मीदवार ने अपना नामांकन पत्र वापस लेकर भाजपा के राजनीतिक इतिहास में एक पृष्ठ को विवादित कर दिया,जो सदैव भाजपाई पक्षीय सोच रखने वालों को अखरता रहेगा। भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष आदित्य देवीलाल ने पार्टी को अलविदा कह दिया और फतेहाबाद के जिलाध्यक्ष बलदेव गरोहा टिकट वितरण को लेकर बाग़ी तेवरों के साथ शीर्ष नेतृत्व के फोक्स पर आ गये। ऐसी स्थिति सिरसा जिलाध्यक्ष नितिशा सिहाग के विवादों से जुड़ गई। भाजपा ने अपनी राजनीतिक जमीं तैयार करने के लिए सिरसा जिला को दो जिलाध्यक्ष दिए,जो पहले भी इसी पद पर आसीन रहे चुके हैं। फतेहाबाद में प्रवीण जौडा एडवोकेट का कार्यभार दिया गया है। सिरसा जिला के डबवाली जिला की जिलाध्यक्ष रेणु शर्मा कालांवाली के पालिका चुनाव में विवादों से घिर गई है। इस लोकसभा क्षेत्र के नरवाना (जींद)को छोड़ कर सभी आठ विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा का कोई विधायक नहीं है और न ही कोई मजबूत चेहरा,जो आमजन की उम्मीद पर खरा उतरने में सक्षम है, जिससे भाजपा के जनाधार में इजाफा हो सके। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व के प्रयास मजबूत नेतृत्व न होने के चलते सफल नहीं हो रहे। इसलिए ऐसे आसार नजर आ रहे हैं कि भाजपा के राजनीतिक मानचित्र में लोकसभा क्षेत्र नहीं है।

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