शीतला अष्टमी 2026: इस दिन क्यों नहीं जलता चूल्हा, जानिए पूजा विधि और माता के प्रिय भोग

नई दिल्ली।हिंदू धर्म में Shitala Ashtami का पर्व विशेष महत्व रखता है। यह दिन Shitala Mata की पूजा के लिए समर्पित माना जाता है, जिन्हें रोगों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजते हैं। धार्मिक मान्यता है कि माता शीतला की कृपा से घर में सुख-शांति बनी रहती है और परिवार बीमारियों से सुरक्षित रहता है।

इस दिन क्यों नहीं जलाया जाता चूल्हा

शीतला अष्टमी की सबसे खास परंपरा यह है कि इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता। लोग अष्टमी से एक दिन पहले यानी सप्तमी के दिन ही भोजन बनाकर रख लेते हैं। अष्टमी के दिन वही ठंडा भोजन माता को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

शास्त्रों और लोक मान्यताओं के अनुसार माता शीतला को शीतलता और शांति की देवी माना जाता है। इसलिए इस दिन अग्नि का उपयोग नहीं किया जाता। मान्यता है कि इस दिन चूल्हा जलाने से माता शीतला अप्रसन्न हो सकती हैं। कई क्षेत्रों में इस पर्व को बसोड़ा या बसौड़ा भी कहा जाता है।

सप्तमी के दिन होती है पूरी तैयारी

शीतला अष्टमी से एक दिन पहले आने वाली सप्तमी को कई स्थानों पर बसोड़ा कहा जाता है। इस दिन घर की महिलाएं अगले दिन के लिए भोजन तैयार करती हैं और घर की साफ-सफाई कर पूजा की तैयारी भी करती हैं। मान्यता है कि श्रद्धा से बनाया गया भोजन अष्टमी के दिन माता को अर्पित किया जाए तो घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।

माता शीतला को लगाए जाते हैं ये विशेष भोग

शीतला अष्टमी के दिन माता को ठंडे भोजन का भोग लगाया जाता है। पारंपरिक रूप से कुछ व्यंजन माता के प्रिय माने जाते हैं—

मीठी पूरी, पुए या मालपुए – सप्तमी के दिन बनाकर रखे जाते हैं और अष्टमी को भोग में चढ़ाए जाते हैं।

मीठे चावल – गुड़ या चीनी से बने मीठे चावल शुभ माने जाते हैं।

हलवा – माता को ठंडा हलवा अर्पित करना भी शुभ माना जाता है।

दूध और दही – शीतलता का प्रतीक होने के कारण दही और दूध का भोग भी लगाया जाता है।

बासी जल – सप्तमी के दिन मिट्टी के पात्र में रखा पानी अष्टमी के दिन माता को अर्पित किया जाता है।

कैसे की जाती है पूजा

अष्टमी के दिन सुबह स्नान के बाद माता शीतला की पूजा की जाती है। कई स्थानों पर लोग मंदिर में जाकर या जहां होली जलाई गई हो उस स्थान पर पूजा करते हैं और ठंडे भोजन का भोग लगाते हैं। माता को नीम की पत्तियां अर्पित करने की भी परंपरा है, क्योंकि नीम को शुद्धता और रोगों से रक्षा का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक मान्यता है कि जो श्रद्धालु नियमपूर्वक शीतला सप्तमी या अष्टमी का व्रत रखकर माता की पूजा करते हैं, उनके घर में सुख-शांति बनी रहती है और परिवार रोगों से सुरक्षित रहता है।

 

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डिस्क्लेमर- यहां दी गई जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं। khabrejunction.com इनकी पुष्टि नहीं करता।

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