अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान को बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता कराने की कोशिश में जुटे पाकिस्तान को उस समय निराशा हाथ लगी जब ईरान ने साफ तौर पर उसकी मध्यस्थता को ठुकरा दिया।
पाकिस्तान के विदेश मंत्री Ishaq Dar ने खुद स्वीकार किया कि अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance के नेतृत्व में एक उच्च-स्तरीय अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल इस्लामाबाद आने वाला था। लेकिन ईरान के अंतिम समय में पीछे हटने के कारण यह दौरा दो बार टालना पड़ा।
इशाक डार ने बताया कि पिछले 10 दिनों में दो बार ऐसा लगा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत संभव हो पाएगी, लेकिन हर बार तेहरान ने प्रस्तावित वार्ता प्रक्रिया को लेकर असहमति जताते हुए पीछे हटने का फैसला किया। उन्होंने माना कि ईरान पाकिस्तान की मध्यस्थता को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है।
ईरान का पाकिस्तान पर अविश्वास क्यों?
ईरान पाकिस्तान को अमेरिका के करीबी सहयोगी के रूप में देखता है, जिससे उसके भरोसे पर असर पड़ता है। इसके अलावा पाकिस्तान के सऊदी अरब के साथ मजबूत रक्षा संबंध भी ईरान के संदेह को बढ़ाते हैं। सुरक्षा कारणों से भी ईरान अपने शीर्ष अधिकारियों को पाकिस्तान भेजने से हिचकिचा रहा है, क्योंकि उसे हमलों का खतरा बना रहता है।
ईरान को यह भी आशंका है कि वार्ता के नाम पर उसे उलझाया जा सकता है और इस दौरान अमेरिका किसी नई सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर सकता है।
भारतीय विशेषज्ञ ने उठाए सवाल
इस घटनाक्रम पर भारत के रक्षा विशेषज्ञ Sushant Sareen ने पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की मध्यस्थ बनने की कोशिश व्यावहारिक नहीं है और मिडिल ईस्ट की राजनीति बेहद जटिल है। सरीन के अनुसार, भारत ने संतुलित नीति अपनाते हुए अरब देशों के साथ संबंध मजबूत रखे हैं, वहीं ईरान के साथ भी रिश्तों को बनाए रखा है।
कुल मिलाकर, ईरान द्वारा पाकिस्तान की मध्यस्थता ठुकराए जाने से इस्लामाबाद की कूटनीतिक कोशिशों को बड़ा झटका लगा है और क्षेत्रीय राजनीति में उसकी भूमिका पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
